सोमवार, जनवरी 20, 2014

भावनात्मकता के मोड़ पर हम क्यों कमजोर ?


अपनी कोख में जीवन के नए अंकुर को पोषण देने वाली सृष्टिस्वरूपा है नारी। धैर्य के साथ अपने घर को सदा के लिए त्याग जीवनसंगिनी बन एक नए परिवार की जिम्मेदारी संभाल लेती है वह, इतना सशक्त होने के बाद भी जाने क्यों एक पुरुष की बेवफाई के आगे वह इस कदर कमजोर हो जाती है कि अपना अस्तिव समाप्त करने जैसा आत्मघाती कदम तक उठा लेती है। सुनंदा पुष्कर के मामले में यहीं हुआ। वह हर तरह से एक सशक्त नारी थी। इस कदर वह भावनात्मक रूप से कमजोर होकर जीवन से हार कैसे मान सकती थी। जिन भावनाओं से नारी संसार को खूबसूरत बनाने का दम रखती है, उन्हीं के आगे हार का ये सवाल अब भी चुभता हैं कहीं। शायद पौराणिक काल से ही नारी अपनी इसी कमजोरी की वजह से दमन का शिकार होने को मजबूर हुई। हर युग में कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाली सहचर्या को पुरुष ने उसकी भावना के स्तर पर क्षीण करने का हथियार शायद बहुत पहले ही पहचान लिया था, इसी वजह से वह उसे इस मोड़ पर ले आता है जहां वह शराबी पति, पिता भाई से मार खाने के बाद भी उनसे जुड़ी रहने की विवशता से बंधी रहती है। भावनात्मकता की इस शक्ति को उसे अपने को हर स्थिति में सशक्त रखने के लिए इस्तेमाल करने की क्षमता विकसित करनी ही होगी। अन्यथा द्रौपदी का चीर हरण और निर्भया का बलात्कार हर युग की कहानी बनती रहेगी। ब्वॉयफ्रैंड के फोन न करने से परेशान होकर ट्रेन के आगे कूद जाने वाली, जहर खाकर जान दे देने वाली प्रवृतियों से बाहर आकर, कुछ सार्थक कर दिखाने की इच्छा बलवती करना बेहद जरूरी है। 

गुरुवार, सितंबर 12, 2013

22 साल के दर्द की दवा तलाशती हूं....


सरबजीत सिंह की बहन से ये बातचीत उनके 3 सितंबर 2012 में नोएडा आगमन पर हुई थी, लेकिन किसी कारण वश ये दैनिक जागरण में प्रकाशित नहीं हुई। आज पुरानी फाइल चेक करते समय इस पर नजर पड़ी तो लगा कि इसे शेयर किया जाना चाहिए। 



- मीडिया से की अपील प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री की पाक यात्रा से पहले उठाए इस मुद्दे को
- पहले ही सरबजीत का मामला गंभीरता से लिया जाता तो घर होता वह
- भाई को वापस लाना ही लक्ष्य
रचना वर्मा,नोएडा:''सरहदों की हदें इस कदर पक्की हैं कि तेरे-मेरे दर्द का उससे वास्ता नहीं, मेरे घर का एक टुकड़ा सरहद के उस पार आज भी है, चंद मीलों के इस फासले को सदियों में तब्दील कर डाला सियासतों के चंद सिलसिलों नेÓÓ पाक में बंद सरबजीत सिंह की दीदी दलबीर कौर के दिल में यहीं सवाल बार-बार उठता हैं कि आखिर उसके छोटे भाई का दोष क्या था, जो उसे अपनों से दूर होकर जिंदगी काटनी पड़ रही हैं। भाई की रिहाई के लिए अभिनेता रजा मुराद की मुहिम के तहत वह उनसे मिलने नोएडा आई थी। भाई के पाक कैदी होने का उनके परिवार को जो सिला मिला वह उन्होंने बयां किया।
नौ महीने तक पता नहीं था भाई का: दलबीर बताती हैं कि पंजाब के भिखीविंड में उनका किसान भाई सरबजीत सिंह खुशी से रह रहा था। 28 अगस्त 1990 को अचानक भाई गुम हो गया। दोस्तों, रिश्तेदारों में ढूंढा, लेकिन नौ महीने तक कुछ पता नहीं चला, अचानक घर में एक चिट्ठी आई। सरबजीत ने इसमें लाहौर कोर्ट में पहली पेशी का पूरा मजमून लिख डाला। पाक हुकूमत ने उसे सीधे साधे किसान से मनजीत कौर बम धमाके के आरोपी का तमगा दे डाला था, उसके बाद इतनी चिïिट्ठयां आई जिनकी गिनती भी नहीं की जा सकती।
हुकूमत ने नहीं लिया गंभीरता से: उनके परिवार की इस दिक्कत को शुरूआती दौर में हिन्दोस्तान की सरकार से गंभीरता से नहीं लिया, वरना अब तक भाई रिहा हो गया होता। उसे एक आम नागरिक की तरह रिहा कराने के बदले उसकी रिहाई की मांग भी आंतकवादी मुद्दे को लेकर की जाती। ये कहना है दलबीर कौर का। वह बताती हैं कि तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव से लेकर गृहमंत्री से वह इस मामले को लेकर मिलती रहीं थी। इस मामले को हवा मीडिया में आने के बाद मिली वह मीडिया की शुक्रगुजार हैं। मीडिया से उनकी अपील है कि सितंबर में प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री की प्रस्तावित पाक यात्रा से पहले इस मुद्दे को उठाएं तो शायद वह इस वर्ष की दीपावली अपने भाई के साथ मना पाएं।
पल-पल कमी महसूस होती है सरबजीत की: सरबजीत  पिता के बाद परिवार में दूसरा मर्द था। जब वह गुम हुआ छोटी बेटी पूनम 23 दिन और बड़ी बेटी स्वपनदीप कौर दो ïवर्ष की थी। बेटियों के सिर बाप का प्यार का साया छीन गया। पैरेंट्स मीटिंग में भाभी सुखप्रीत अकेली जाती, बच्चे पिता के बारे में पूछते तो उसकी आंखों से आंसू झरते। घर की आर्थिक स्थिति भी खराब हो चली थी। पिता सुलखन भाई की फोटो को सोने से पहले सैल्यूट करते और कहते 'साब जी में सोने चला, तुमसे मिलना चाहता हूं, जल्दी आ जाओं कहीं तुम्हारे आने से पहले न चल दूं।Ó गांव के किसी भी समारोह में जाते भाई को याद कर रोते रहते। एक दिन इसी दुख में चल बसे।
खुशी देकर गम दिया: वह बताती है जब मीडिया में हर तरफ उनके भाई की रिहाई की खबरें चल रही थी, परिवार में जश्न का माहौल था। अचानक जैसे घर में मातम छा गया, क्योंकि भाई की जगह सुरजीत की रिहाई हुई। हालांकि ये अच्छा हुआ कि किसी को तो उसके घर वापस आने को मिला।
22 साल से राखी को इंतजार: वह कहती हैं कि विवाहित होने के नाते कई बार उन्हें भाई की रिहाई की इस मुहिम के लिए ससुरालवालों के खिलाफ भी जाना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य ही भाई को वापस लाना बना लिया है। 22 साल से उनकी राखी भाई की कलाई का इंतजार करती रहीं। वह बाघा बार्डर पर जाकर फौजियों को राखी बांधती रहीं, लेकिन जब भी वहां जाती दो सरहदों पर खिंची उस लाइन को घंटों देखा करती। सोचती ये न होती लाहौर और बाघा साथ मिलकर प्यार का गीत गाते।
राहुल गांधी के लिए दुआ: वर्ष 2008 में राहुल गांधी ने सरबजीत के मामले को गंभीरता से लिया। इसके बाद सोनिया जी, गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे, विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने भी उनके मन में उम्मीद जगाई है। राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के बेटे अभिजीत मुखर्जी की पहल के लिए उनका परिवार अहसानमंद है। पाक में असमां जहांगीर, एनजीओ और आसिफ अली जरदारी की ईमानदार कोशिशों के साथ ही अपने देश के हर एक बाशिंदे से मिले सहयोग को सलाम करती है।
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रचना वर्मा  

शुक्रवार, सितंबर 06, 2013

बांसुरी है जीवन सरीखी: पंडित हरिप्रसाद चौरसिया




- बांसुरी अजेय है और रहेगी
-हुनर की तुलना करना ठीक नहीं
- संगीत की एक है बोली
रचना वर्मा,नोएडा: ''मुझे अंग्र्रेजी अधिक नहीं आती, बच्चों हिंदी में बात करूंगा तो समझ जाएओ ना... चेहरे पर विस्मित कर देने वाली कृष्ण सरीखी मुस्कान, अधरों से कुछ दूरी पर हाथों में  बांसुरी...ÓÓ कुछ इस अंदाज में मशहूर बांसुरी वादक पंडित हरिप्रसाद चौरसिया सेक्टर-56 स्थित सरला चोपड़ा डीएवी सेंटनेरी स्कूल में छात्रों से रूबरू हुए। इस दौरान उन्होंने बांसुरी और उसके भविष्य को लेकर विशेष बातचीत की।
चंद्रमा और बल्ब के प्रकाश की तुलना नहीं: बांसुरी वादन के शिखर पर पहुंचने वाले पंडित चौरसिया न  बांसुरी वादन का भविष्य उज्जवल बताया। उन्होंने कहा कि आधुनिक वाद्य यंत्रों के बीच आज भी बांसुरी अजेय है, क्योंकि बल्ब का प्रकाश अलग है और चंद्रमा का अलग। बांसुरी भूत में थी, वर्तमान में है और भविष्य में भी रहेगी। ये वाद्य पूरे विश्व में अपनी पहचान बना चुका है। भले ही नई पीढ़ी बांस की बनी बांसुरी न बजाती हो, लेकिन कहीं स्टील तो कहीं अन्य वस्तुओं से बनी बांसुरी वह अपने संगीत में शामिल कर चुकी है।
जीवन सरीखी है बांसुरी: बांसुरी सबसे पुराना वाद्य यंत्र है। भगवान श्रीकृष्ण की सोच ने इसे लोक वाद्य बनाया और उन्ही की तरह ये हर जगह पहुंच गई। इसका निर्माण कारखाने में नहीं होता। एक तरह से बांसुरी मानव जीवन सरीखी है, इसकी उम्र और जीवन -मरण भी अनिश्चित है। इसके लिए जंगलों से चुन के बांस लेना पड़ता है, वह बांस सीधा और गांठ रहित होना आवश्यक होता है। इसके निर्माण के बाद मानव जीवन की तरह ही इसके चलने का कोई पता नहीं होता।
सामान्य और साधारण ही होता है अप्रितम: पंडित चौरसिया ने कहा कि जो भी सादगी से परिपूर्ण है, वह मधुर है, सुंदर, अप्रितम है, संगीत के साथ भी ये बात लागू होती है। ये जरूरी नहीं आगे आने वाले बांसुरी वादन की पीढ़ी उनकी बांसुरी वादन की विरासत को आगे बढ़ाए, इसलिए वह हुनर की तुलना को सही नहीं समझते। जिस तरह हर फूल की अपनी खूबसूरती होती है, उसी तरह हर एक के हुनर की अपनी खासियत होती है।
संगीत का एक है मजहब: बांसुरी पर ओम जय जगदीश भी बजता है और जिंगल बेल जिंगल बेल भी दोनों ही संगीत का रूप है भले ही भाषा अलग हो। संगीत कहीं का भी हो, उसके स्वर लय एक है। संगीत किसी देश या क्षेत्र विशेष का नहीं होता, बस हमारे विचारों का अंतर ही इसे देश काल की परिधि में बांधता है। ये बात फिल्मी संगीत पर भी लागू होती है, स्वर अच्छे लगे, लय, ताल ठीक हो, अच्छे से लिखा गीत हो तो फिल्मी संगीत भी अच्छा है। इतना ही कहंूगा कि जो जिसको भा जाएं वो अच्छा है।
संघर्ष में है जीवन का आनंद: पंडित चौरसिया बताते हैं कि उनके पिता उन्हें कुश्ती के दांव सीखा पहलवान बनाने के इच्छुक थे। पिता की इस इच्छा से उन्हें जीवन से संघर्ष करने की सीख मिली। जिस तरह कुश्ती में जीतने के लिए संघर्ष करना पड़ता है, उसी तरह जीवन के हर क्षेत्र हर विषय में संघर्ष हैं, क्योंकि संघर्ष में ही जीवन का आनंद है
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गुरुवार, जून 27, 2013

साल रहा अपनी ही जमीं में जमींदोज होने का दर्द





- राहत सामग्र्री को भी तरसे आपदाग्र्रस्त इलाकों के बाशिंदे
- घर-बार सब ले गया पानी का बहाव, अब जिंदगी के बहाव की चिंता रही साल 
- भूखे-प्यासे बच्चों की जिंदगी बचाने के लिए नमक भी मुश्किल से नसीब 
... अपनी ही जमीं में जमींदोज हो जाना और पल-पल जिन्दगी की टूटती सांसों को थामने की जद्दोजेहद लगे रहना, कुछ ऐसे ही असहनीय और अकल्पनीय दर्द को प्राकृतिक आपदाग्र्रस्त उत्तराखंड के स्थानीय बाशिंदे रोज झेल रहे हैं। आपदा में फंसे तीर्थयात्रियों और पर्यटकों को वहां से बाहर निकलने के लिए शासन-प्रशासन सब एक जुट है, लेकिन यहां की मिïट्टी में रचे-बसे लोगों को उनके पैरो तले जमीन और छत दिलाने की कोशिश का कहीं निंशा तक नहीं दिखता। ये केवल चमोली के गांव नारायणबगड़ की ही हकीकत नहीं बल्कि आपदाग्र्रस्त देवभूमि के जर्रे-जर्रे का यही हाल है। आपदा के मारे इन लोगों के पास अपनी ही मिïट्टी में दम साधने के सिवा कोई चारा नहीं बचा है।
एक था नारायणबगड़: कर्णप्रयाग से ग्वालदम को जाने वाला मुख्य मार्ग चमोली के नारायणबगड़ गांव की पहचान था। अंग्र्रेजों का  बनाए 150 वर्ष पहले बनाए नारायणबगड़ पुल का ऐतिहासिक महत्व का गवाह था। इस इलाके में 150 लोग अपनी गुजर -बसर ढाबो और छोटे-मोटे व्यवसाय कर चला लेते थे, लेकिन 15 जून के बाद यहां का मंजर पूरी तरह बदल गया है। 40-50 लोगों के रोजी-रोटी का सहारा छिन गया, घर-द्वार सब आपदा ने लील लिया। इन स्थानीय लोगों का यहां रहना इनकी मजबूरी ही नहीं बल्कि अपनी जन्मभूमि से जुड़ाव भी है। इन लोगों को एयर लिफ्ट करके यहां से बाहर जाने की आस नहीं, लेकिन हेलीकॉप्टर की राहत सामग्र्री का इंतजार जरूर है। इस पर भी पर्यटकों और यात्रियों को आपदाग्र्रस्त इलाके से बाहर निकालने चिंता में इन स्थानीय बाशिंदों की अनदेखी हो रही है। दवाईयां तो दूर रसद भी यहां नहीं पहुंच पा रही है।
आंखों में बेघर होने का दर्द और सिर पर 15 भूखे पेट पालने की चिंता: ढाबा चलाकर विरेन्द्र सिंह कठैत और उनकी पत्नी पार्वती 15 लोगों को परिवार पालते थे।
ये दंपत्ति अपने चार बच्चों के साथ ही स्वर्गीय बड़े भाई के तीन बच्चों के साथ ही बहन के चार बच्चों का भी पेट पाल रहे थे। अब न इनके पास ढाबा रहा और न घर। पार्वती की आंखों में आंसू रूकने का नाम नहीं ले रहे, आगे बच्चों के भविष्य क्या होगा यही सोच कर वह गश खाकर गिर जाती हैं। विरेन्द्र सिंह ने बताया कि सड़क किनारे ढाबे के ढहने के बाद उन्होंने जैसे -तैसे प्राथमिक स्कूल में शरण ली। उनके गांव के कुछ लोगों की मदद से उन्हें थोड़े चावल मिले है उन्हें पानी में नमक मिलाकर वह बच्चों को दे रहे है। हर सुबह उन्हें यह चिंता रहती हैं कि बच्चों को कहीं कुछ हो न जाएं। प्रशासन या अन्य किसी बाहरी सहायता उन्हें नहीं मिली है।
घर की चाबी की गुच्छा है संपत्ति के नाम पर: आंगनवाड़ी कार्यकर्ता जानकी अपनी बेटी और बूढ़े पिता के साथ सड़क पर है, पानी के रेले में ढहते किराए के आशियाने की याद कर वह फफक पड़ती है। तलाकशुदा इस महिला का कहना है कि उन्हें समझ नहीं आ रहा हैं कि वह कहां जाएंगी, न आमदनी का सहारा रहा और न घर का ठिकाना। उनके पास संपत्ति  के नाम पर तीन चाबियों वाला गुच्छा भर ही रह गया। आंखों की कोर में बार-बार आती नमी को पोछते हुए इतना ही कहती हैं कि शासन यहां से लोगों के बाहर निकलाने और उनकी कुशलता के लिए तो प्रयास कर रहे हैं, लेकिन वह तो यहीं के रहने वाले है वह कहां जाएं। किसी भी प्रकार की सहायता न मिलने से उनके लोग भूख और प्यास से बेहाल है।


गिरीश तिवारी की केदारनाथ से दी गई जानकारी के बाद मेरे द्वारा लिखी गया हाल-ए- केदारनाथ

शुक्रवार, जून 21, 2013

मासूम आंखों में समाया प्रकृति का भयावह रूप



- समझ आया आपदा में भोजन का महत्व
- प्रकृति के लिए न बने कठोर
- डूबते मकान और सड़के देख डर बैठ गया मन में

 छह जून को हम 14 छात्रों का दल इनमी ट्रैंकिंग दल के साथ दिल्ली से ऋषिकेश के लिए निकला। सात जून सुबह ऋषिकेश बेस कैंप पहुंचे। कल्पना भी नहीं की थी वापसी में उस बेस कैंप का नामोनिशां तक नहीं रहेगा। सात जून से 20 जून घर पहुंचने तक मेरी आंखों में पानी में डूबती सड़कों और मकानों का मंजर खौफ जगाता रहा। प्रकृति के इस भयावह रूप के दर्शन मैंने अपने पांच साल की ट्रैकिंग में कभी नहीं किए थे। घर सही सलामत वापस लौट कर मुझे इतना समझ आ गया कि हमें पर्यावरण के प्रति कठोर नहीं होना चाहिए, पेड़ काटने पर लगाम लगानी चाहिए, अपनी नदियों को प्रदूषण से बचाना चाहिए। इस वाकये के बाद मैं और मेरे दोस्त पर्यावरण संरक्षण के लिए जागरूकता फैलाने में अपना पूरा योगदान देंगे। टिहरी जैसे डैम बनाने से पहले 10 बार सोचना चाहिए।
सात जून को ऋषिकेश बेस कैंप से हम केदारनाथ से भी आगे दियारा टॉप के लिए निकले कम से कम जमीन से 11,000 फीट ऊपर दियारा चारगाह में चार दिन बिताने के बाद हम वापस लौट रहे थे, अंदाजा भी नहीं था कि नीचे इतनी तबाही मची हुई है, 15 जून को बारिश हो रही थी, हमारे साथ गए इंस्ट्रक्टर फोन पर मौसम का हाल पूछ- पूछ कर हमारे दल को आगे लेकर बढ़ रहे थे। रास्ते में पानी के साथ बहते बड़े-बड़े मकान, पानी पर तैरते कार, ट्रक और बचाने की गुहार लगाते लोग, पानी में डूबती जाती लंबी-लंबी सड़के देख हम सभी काफी डर गए। 16 जून की सुबह हम उत्तरकाशी पहुंचे, लेकिन पता चला की जिस ऋषिकेश के जिस बैस कैंप में हम ठहरे थे, वह बह गया। हमारे दल के लिए वह सबसे बड़ा सदमा था। छह लड़कों और आठ लड़कियों के हमारे दल में कई बच्चे होम सिकनेस का शिकार हो गए। दो लड़कियां की हालत ज्यादा बिगड़ गई। अलग-अलग तरह के भयावह ख्याल आ रहे थे, घर नहीं पहुंच पाएं तो बस के चलते-चलते रोड धस गई तो, हम सब आपस में ऐसी ही बातें कर रहे थे।   उत्तरकाशी के राधिका होटल में हमारा दल रूका था और 10 दिनों में भेलपूरी और ब्रेड बटर ही हमारा भोजन था। हमारे इंस्ट्रकटर पानी और भोजन बरबाद न करने को कह रहे थे और हम सबको पहली बार पता चला कि भोजन का महत्व क्या है। हम सारे होटल की छत पर खड़े होकर प्रकृति की विनाशकारी शक्ति का आकलन अपने- अपने अंदाज में कर रहे थे। हमारे सामने बिल्डिंग जमीनदोंज हो रही थी, लोग अफरा-तफरी में भाग रहे थे। इस बीच हमारे इंस्ट्रक्टर्स को हमारे अभिभावकों के लगातार फोन आ रहे थे, वह हमारे बारे में काफी चिंतित थे। हमारे इंस्ट्रक्टर्स हमसे तैयार रहने को कह रहे थे। 19 जून को बारिश की रफ्तार कम हुई और हम बस के जरिए ऋषिकेश पहुंचे और यहां से दिल्ली के लिए निकले। 20 जून की रात दो बजे हम दिल्ली पहुंचे। लगभग 18 घंटे की इस यात्रा में हम यहीं मना रहे थे कि घर पहुंच जाएं। दिल्ली पहुंचते ही सभी के मां -पापा गले लग कर हमें प्यार कर रहे थे, कई बच्चों की मम्मियां रो रही थी। मैं हमेशा ट्रैकिंग से आकर अपने रूम में चला जाता था, लेकिन इस बार ऐसा पता नहीं क्या था कि मां को गले लगाकर कुछ मिनट तक सोचता रहा।
प्रस्तुति : 14 वर्षीय करन नाग, सेक्टर-36 नोएडा

रविवार, मई 19, 2013

हां मैं हिरोइन हूं...



बचपन में एक बार मेरी बुआ ने मुझे 'हिरोईनÓ कहा तो मैं ऐसी बिदकी जैसे कि किसी ने मुझे विषैला डंक मार दिया हो, उस छोटे से पहाड़ी कस्बे अल्मोड़ा की आबो हवा में पली एक लड़की के लिए 'हिरोईनÓ का अर्थ शायद उतना ही भद्दा और अभद्र था जैसे कोई गाली। ये उस वक्त की बात है जब शायद मैं 20 वर्ष के उस सुहाने से दौर से गुजर रही थी, जब मन सपनों के आकाश में उड़ान भरा करता था और कल्पना के सागर में गोते लगाया करता था। उस दौर और आज के दौर में हिरोईन का अर्थ मेरे लिए कितना व्यापक हो गया ये मुझे आज एक चैनल पर हिरोईन मूवी के देखते समय हुआ। पत्रकारिता के इस पेशे में रहते हुए उम्र का तीसवे पड़ाव पर मुझे भी अपनी स्थिति उस हिरोईन जैसी ही लगी। हालांकि हिरोईन जैसी सफलता का आकाश तो मैंने नहीं छुआ, लेकिन एक छोटे से कस्बे से आकर दिल्ली -एनसीआर के पत्रकारिता जगत में एक छोटा सी जगह बना ली। पत्रकारिता का जगत फिल्मी दुनिया से ज्यादा अलग नहीं है, बस अंतर इतना ही है कि यहां पर्दे पर अभिनय नहीं होता, वास्तविक अभिनय जरूर होता है, वहीं नैतिक मूल्यों से परे कि प्रतिस्पर्धा। मीडिया हॉउस में विशेषकर प्रिंट मीडिया में सजावटी तौर पर महिलाओं और युवतियों का प्रतिनिधित्व है। यहां भी काबिलियत को कम चिकने चमकते चेहरों पर करियर का ग्र्राफ टिका करता है। शायद यौवन की दहलीज पर पत्रकारिता में कदम रखने के बाद भी मैं ये समझ नहीं पाई थी, क्योंकि ईमानदारी से पत्रकारिता और रिपोर्टिंग का जुनून मेरे सिर पर सवार था, पर उम्र के 36 वें पड़ाव पर मेरा हाल भी हिरोईन फिल्म के किरदार मेघा अरोड़ा की तरह असुरक्षा की भावना से भरा रहता है। लगने लगा है 11 वर्ष इस पेशे में खून पसीना लगा दिया, लेकिन अब भी खाली हाथ और ऐसा एकाकीपन जो शायद कभी खत्म ही न हो। कभी-कभी इस पेशे में आ रही युवा फैशनपरस्त लड़कियों से भी स्वंय को असुरक्षित महसूस करने का भाव। उसमें मेरे अपने पेशे के प्रति मेरा समर्पण भी मुंह चिढ़ाने लगता है। 

रविवार, अप्रैल 28, 2013

नारी सशक्तिकरण: हौसले से बदल डाली तकदीर की तस्वीरें






- महिला हस्तशिल्पियों ने बयां की नारी सशक्तिकरण की कहानी
- हाथ के हुनर को बनाया आत्मनिर्भरता का हथियार
- विषम परिस्थितियों में नहीं मानी हार
रचना वर्मा,नोएडा: ख्वाबों की ताबीरों के लिए हिम्मत और हौसलों का हासिल ही सब कुछ है, क्या हुआ जो तालीम का मौका नहीं मिला, क्या हुआ जो शहरों में रहने का सिलसिला नहीं मिला,अपने हुनर से किस्मत का रूख मोड़ ख्वाबों को धरातल पर ला खड़ा किया। देश के विभिन्न राज्यों से सेक्टर-21 ए स्टेडियम में गांधी शिल्प बाजार में आई प्रत्येक महिला हस्त शिल्पी की अपनी कहानी है, लेकिन सुदूर गांवों में रहने वाली इन महिलाओं ने अपनी कला से नारी सशक्तीकरण को देश में सच कर दिखाया है। यहां लगी 150 स्टॉल में 25 फीसद इन महिलाओं की हैं। अपने परिवार में ही नहीं बल्कि गांव में इनकी सफलता अन्य महिलाओं को भी प्रेरणा दे रही है।
हुनर से संभाला तलाक के बाद परिवार: अलीगढ़ के अमीनिशा की 32 वर्षीय शाहना के जिंदादिल मिजाज को देख शायद ही कोई इस महिला के दर्द का अनुमान लगा पाएं। 11 वर्ष पहले पति ने तीन बच्चों के साथ उन्हें अकेला छोड़ दिया, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपने हाथ के हुनर को ही मुफलिसी और मुसीबत से निकलने का हथियार बना डाला। 10 वीं पास अमीना एपलिक और पैच वर्क के काम से अपना अलग मुकाम बनाया। वह बताती हैं कि जिंदगी में सफल होने के लिए हिम्मत और हौसला होना चाहिए। उनकी स्टॉल पर पैच वर्क का सामान लेने आने वाले भी उनकी खुशमिजाजी के कायल हुए बिना नहीं रहते।
घर-घर जाकर बेचा कांथा: 15 वर्ष पहले जब पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले के उत्तराकोना गांव की पदमा घर-घर जाकर कांथा (कपड़े पर कढ़ाई) के कपड़े बेचा करती थी, तो उन्होंने सोचा भी नहीं था कि उनका ये काम उन्हें ही नहीं उनके परिवार को अलग पहचान दिलाएगा। वह बताती हैं कि शादी के बाद उन्होंने परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए ये काम सीखा। कई बार लोग कपड़े पर काम करने को नहीं देते थे, लेकिन उन्होंने भी ठान ली कि पीछे नहीं हटना। मौजूदा समय में उनके कांथा वर्क की मुम्बई तक मांग है। उनके अंडर 150 लड़कियां रोजगार पा रही है। महीने में 10 से 20 हजार की कमाई हो ही जाती है।
ससुराल में जमाई धाक: कोलकता की 35 वर्षीय सीमा बनर्जी को शीप लेदर के काम में महारत हासिल है। शादी से पहले वह ये काम किया करती थी, लेकिन उसके बाद भी उन्होंने अपने इस शौक को इस कदर बढ़ाया कि उनके सुसराल वाले उनके कायल हो गए। शीप लेदर के पर्स और अन्य सामान बनाकर वह आस्ट्रेलिया, कनाडा, यूएस में भी अपने काम को पहचान दिला चुकी है। उनके इस व्यवसाय से उनके पति भी जुड़ गई हैं।
पत्थर को तराश कर बनाती है क्रिस्टल: तमिलनाडु के त्रिचनापल्ली की मंजुला और सुलोचना कठोर पत्थरों को क्रिस्टल की खूबसूरत मालाओं में तब्दील करती है। तांबे के तार में भी इन क्रिस्टल को पिरोना का काम करती है। दोनों बताती है कि इससे परिवार की आय भी बढ़ती है और उनके खुद के खर्चे का इंतजाम भी हो जाता है।
राज्य स्तरीय अवार्ड तक बनाई पहचान: आठ साल की उम्र में कांथा स्टिच का काम पकड़ा और उसे इस मुकाम तक रजिया ने लाकर छोड़ा, जहां कोलकता ही नहीं बल्कि पूरे देश में उनका कांथा मशहूर होने लगा। ऐसे रूढि़वादी परिवार में जहां औरत के सिर से पल्लू हटने को भी बड़ी गलती माना जाता है, सिर पर पल्लू रखकर ही उन्होंने सफलता की इबारत लिख डाली।
जूट के बैग से पल रहा परिवार का पेट: बिमला ने शादी के बाद पति की गरीबी का रोना नहीं रोया, बल्कि उनके जूट के बैग बनाने के कारोबार में रम गई। पति जूट के बैग बनाते है और वह उनकी कटिंग करती है। उनकी स्टॉल में सजे जूट के बैग उनकी कलात्मकता को बताते हैं। वह कहती हैं कि उन्हें संतुष्टि है कि उनका परिवार चल रहा है।
अपनी कमाई से आत्मनिर्भरता का अहसास:सेक्टर-31 निवासी 33 वर्षीय अक्षिता अग्र्रवाल के चेहरे पर उनके आत्मनिर्भरता का अहसास साफ झलकता है। शादी के बाद आकांक्षा ने अपनी कमाई करने के लिए पुराने कपड़े से मल्टी परपज पाउच के हुनर को निखारा। आज उन्होंने अपने इस काम से पांच जरूरतमंद लड़कियों को रोजगार दिया है।
अविवाहित रहकर संभाली परिवार की जिम्मेदारी: असम की 50 वर्षीय मीना अविवाहित है। उन्हें असम सिल्क के काम में प्रवीणता है। गोवाहटी में अपने परिवार की वह सर्वेसर्वा है। उन्होंने अपने काम से परिवार की जिम्मेदारियों को बखूबी अंजाम दिया है।
हर एक का संघर्ष सफलता की कहानी: इटोंजा की 40 वर्षीय रूबीना ने पति के कैंसर से भी हार नहीं मानी और कुशलता के साथ चिकन के कारोबार संभाला। गुजरात की गीता, सीता ने भी जरी के काम को परिवार के पालन का जरिया बना डाला। अरूणाचल की टोका रूपा ने कागज के फूलों, आंन्ध्रा के गांव निम्मलकुंटा की ममता ने बकरी के चमड़े पर कलमकारी हस्तकला के रंग बिखेरे, बिहार की अंजू केसर और परिवार की जरूरतों को पूरा किया।
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रचना वर्मा


इस उजली तस्वीर में है स्याह भी बहुत कुछ





- 1952 के बाद जिले को नहीं मिली महिला विधायक
- पीएनडीटी एक्ट के तहत मात्र दो अल्ट्रासाउंड केंद्रों पर कार्रवाई
- बालिकाओं की संख्या में भी जिला पिछड़ा
- आधी आबादी साक्षरता में भी रह गई पीछे
संवाददाता,नोएडा: नारी सशक्तीकरण की एक उजली तस्वीर है आज का दौर, लेकिन इस तस्वीर में अभी भी ऐसे कई स्याह पहलू जिन्हें उजला किए बिना आधी आबादी को अपने अस्तिव की जंग जीतना मुश्किल लगता है। फिर चाहे वह शिक्षा देने के मामले में लड़कियों के साथ होता भेदभाव हो या फिर कन्या भ्रूण हत्या का भयावह सत्य।
 लिंगानुपात में प्रदेश में चौथा संवेदनशील जिला गौतमबुद्ध नगर:  भ्रूण हत्या में यूपी के 10 जिलों में गौतमबुद्धनगर चौथे स्थान पर है। यहां प्रति हजार लड़कों पर वर्ष 2011 में 852 लड़कियां है। एक हजार पुरुषों पर स्त्रियां 10 वर्ष पहले यह संख्या 841 थी।  वहीं 0-6 वर्ष के आयु वर्ग में भी जिला बदनाम है। यहां एक हजार लड़कों पर मात्र 845 बच्चियां है। साल 2011 की जनगणना में पश्चिमी यूपी का लिंगानुपात 908 से नीचे हैं। गौतम बुद्ध नगर यूपी के 71 जिलों में दूसरी बार लिंगानुपात में सबसे फिसड्डी रहा। लिंगानुपात का ये भारी अंतर कहता है, कहीं कुछ गड़बड़ तो जरूर है। पश्चिमी यूपी आने वाले समय में बेटियों को तरसेगा।
पीसीपीएनडीटी एक्ट का जिले में हाल: जन्म से पूर्व लिंग परीक्षण प्री कंस्पेशन एंड प्रीनेटल डाइगनोस्टिक एक्ट(पीसीपीएनडीटी) के तहत अपराध है, लेकिन पूरे प्रदेश में इस एक्ट का प्रभावी प्रयोग नहीं हो पाया है। यूपी में इसके तहत वर्ष 2002 से 2013 तक 57 कोर्ट केस रजिस्टर हुए। इसमें से केवल आठ का निपटारा हुआ, लेकिन सजा किसी को नहीं हुई। जिले में इस एक्ट के तहत वर्ष 2005 में सेक्टर-12 और 22 के अल्ट्रासाउंड केंद्रों का रजिस्ट्रेशन रद्द किया गया। ये केस अदालत में लंबित है।
जिले के अनाथ आश्रमों लड़कियों हैं अधिक: जिले के अनाथ आश्रम सबूत है कि लड़कियों को लेकर समाज की मानसिकता में अधिक बदलाव नहीं आया है। यहां रहने वाले बच्चों में लड़कियों की संख्या अधिक है। सेक्टर-12 स्थित साईं कृपा आश्रम के 42 बच्चों में केवल 14 ही लड़के हैं। सेक्टर-19 ग्र्रेस होम के 106 बच्चों में 60 फीसद लड़कियां हैं। सीडब्ल्यूसी के बालगृह में भी वर्ष 2011 में दो से चार महीने की तीन नवजात बच्चियां आईं।
पीएनडीटी एक्ट पर भारी सामाजिक भ्रांतियां : सुप्रीम कोर्ट में कन्या भ्रूण हत्या को लेकर पब्लिक इंटरस्ट में लिटिगेशन डालने वाली एडवोकेट कमलेश जैन कहती हैं कि हमारे समाज में बेटियों को लेकर इतने मिथ है कि मां बेटी को पैदा करने से पहले 10 बार सोचती है। पुत्र के पिता को मुखाग्नि देने से ही मोक्ष मिलता है, खानदान का नाम उसी से चलता है इस तरह के कई मिथ है। इस सदी में कंचकों को तरसती पीढ़ी अभी भी नहीं समझती की बेटियां सृष्टि के लिए कितनी जरूरी है। बेटा होने पर परिवार में मां का रूतबा बढऩे की परंपरा अभी भी कायम है। वह बताती है कि पीएनडीटी एक्ट को पीसीपीएनडीटी कर दिया गया, लेकिन अभी भी यह आइपीसी के बराबर प्रभावी नहीं हैं। ट्रायल के दौरान चिकित्सक को सस्पेंड नहीं किया जाता। सजा और जुर्माना भी कोई खास नहीं है अधिकतम तीन साल की सजा और जुर्माने के तौर पर कम से कम एक हजार से अधिकतम 50 हजार से कम ही जुर्माना होता है। अल्ट्रा साउंड केंद्र का पंजीकरण रद्द करने की कार्रवाई होती है,लेकिन उसमें काफी समय लगता है। इसके साथ ही जांच में जाने वाले चिकित्सकों को कोई सुरक्षा नहीं मिलती, इसलिए सेक्स डाइगनोज कराने वालों के हौसले बुलंद है। ़
राजनीतिक परिदृश्य में भी आधी आबादी हाशिए पर: जिले के राजनीतिक परिदृश्य में भी महिलाएं हाशिए पर है। फरवरी 2012 में हुए विधान सभा चुनावों में दादरी, जेवर और नोएडा विधान सभा सीट पर किसी भी राजनीतिक पार्टी ने महिलाओं को टिकट नहीं दिया। 62 नामांकनों में चार महिला प्रत्याशी मैदान में उतरी थी। जिले में 1952 में धूममानिकपुर से चुनी गई विधायक सत्यवती के बाद कोई महिला विधायक नहीं बनी। जिले से संसद के गलियारों तक भी कोई महिला नहीं पहुंच पाई।  
 औसत साक्षरता में पिछड़ी आधी आबादी: जिले में  10 वर्षों के अंतराल में विकास के काफी बड़े दौर तय किए,लेकिन एक चीज जो पीछे थी और पीछे ही रह गई। ये है 10 वर्षों में पुरूष और महिला के औसतन साक्षरता प्रतिशत। वर्ष 2001 में पुरुषों का साक्षरता फीसद 81.26 था तो महिलाओं का 57.70 और 2012 में पुरूष की साक्षरता दर बढ़कर 90.23 फीसद पहुंची, तो महिलाएं 72.78 पर आकर रूक गई।
 लड़कियों की शिक्षा में भी बदहाली: प्रदेश में 10 वीं के बाद स्कूल छोडऩे वाली छात्राओं की बढ़ती संख्या भी इसका प्रमाण है। 2010 में 15 लाख 48 हजार 405 छात्राओं ने 10 वीं में पंजीकरण करवाया, लेकिन मात्र 14 लाख 23 हजार 425 छात्राओं ने परीक्षा दी। इसमें 10 लाख 94 हजार 967 छात्राएं उत्तीर्ण हुई, लेकिन इनमें से 11 वीं कक्षा में नौ लाख 67 हजार 713 छात्राओं ने पंजीकरण कराया। माध्यमिक शिक्षा अभियान में सामने आया कि इनमें से एक लाख 27 हजार 254 छात्राओं ने 10 वीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी। 11 वीं में पंजीकरण न करवाने का यह आंकड़ा भयावह है, यहीं हाल जिले में आठवीं के बाद स्कूल छोडऩे वाली लड़कियों का भी है। इससे जिले और प्रदेश में लड़कियों की शिक्षा पर भी सवालिया निशान लगता है।
असुरक्षा लड़कियों की शिक्षा में बाधक: जिलें में यूपी बोर्ड के सेकेंडरी और हायर सेकेंडरी के कुल 124 स्कूल हैं। इनमें दो सरकारी,  45 एडेड और 77 अनअडेड स्कूल है। इन स्कूलों में कम ही छात्राएं पहुंच पाती है। इसके पीछे एक बड़ा कारण है, इन स्कूलों का दूर-दराज होना। इससे गांव देहातों में रहने वाले अभिभावक लड़कियों को स्कूल नहीं भेजते। सरकार द्वारा लड़कियों को शिक्षा तक खींचने की 'कन्या विद्या धन और पढ़े बेटी -बढ़े बेटीÓ जैसी अच्छी योजनाओं पर ही असुरक्षा भारी पड़ती है।
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रचना वर्मा

आधे फलक के चांद-सितारे नहीं मेरे हिस्से का पूरा आसमां चाहिए





- कुश्ती में मुकाम और लड़कियों के लिए प्रेरणा
- पेट्रोल पंप पर लड़कों की तरह काम करने पर है गर्व
- महिलाओं को समर्पित एक महिला

रचना वर्मा,नोएडा:
कॉमन इंट्रो  ''मुझे मेरे हिस्से का पूरा आसमां चाहिए, आधे फलक के चांद-सितारों से नहीं सजेगी मेरी दुनिया, मुझे दुनिया में आधी नहीं पूरी आबादी का हक चाहिए, बेचारी अबला नहीं और न ही आंखों में पानी, अब मुझे बदलनी है खुद की कहानी, जिन्दगानी के स्याह अंधेरों में रोशनी की लौ जलाने की कोशिश जारी है, भरोसा है मुझे, विश्वास है कायम कि एक दिन वो नई सुबह जरूर आएगी जब नारी अबला नहीं सबला बन दुनिया के फलक पर अलग मुकाम पाएंगी।ÓÓ इस जज्बे के साथ आठ मार्च को अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस पर ये अपने अस्तिव का उत्सव मनाएंगी। दुष्कर्म, दहेज हत्या, कन्या भ्रूण हत्या और अपने ही घरों में दोयम और निरीह करार दी जाने वाली नारी शक्ति इतने अत्याचारों, भेदभाव के बाद भी अपने अस्तित्व का पुरजोर अहसास करा रही है, हर क्षेत्र में अपने सार्थक प्रयासों से वह कह रही है हम किसी से कम नहीं। ये सच भी है, क्योंकि इस वर्ष महिला दिवस की थीम द जेंडर एजेंडा गेनिंग मोमेंटम भी यही गुनगुना रही हैं।
बबीता ने दी सादुल्लापुर की लड़कियों को प्रेरणा: गांव के माहौल में जहां लड़कियों को स्कूल भेजने में भी लोग सौ बार सोचते हैं, उसी गांव की बबीता नागर ने पुरूष वर्चस्व के क्षेत्र कुश्ती दंगल में अपना अलग मुकाम बना डाला। लगभग 12 हजार की आबादी वाले इस गांव में उन्हीं की बदौलत कई लड़कियों के सपने साकार होने को है। ग्र्रामीण बच्चियों को केवल स्कूल ही नहीं बल्कि खेल के मैदानों में भी भविष्य बनाने के लिए भेज रहे हैं। किसान परिवार से ताल्लुक रखने गांव की बबिता नागर के बुलंद इरादों का यह परिणाम है। मौजूदा समय में बबिता दिल्ली में सब इंस्पेक्टर पद पर तैनात हैं। राष्ट्रीय स्तर की रेसलर बबीता बताती हैं कि जब उन्होंने रेसलर बनने का सोचा तो उन्ही के ताऊजी मनीराम पहलवान ने उनके पिता प्रभुसिंह से कहा कि लड़कियों का क्षेत्र नहीं है, लड़की बिगड़ जाएगी, लेकिन पिता और मां शीला देवी के स्पोर्ट से उन्होंने अपने इस शौक को सुनहरे भविष्य में बदल डाला। वह कहती हैं कि पीठ पीछे गांव वाले उन्हें पागल कहा करते थे, लेकिन अब हाल यह है कि गांव के हर घर में उनकी मिसाल दी जाती है, हर बड़े समारोह में उनकी उपस्थिति अनिवार्य मानी जाती है। प्रत्येक ग्र्रामीण अपनी बेटी को बबीता बनते देखना चाहता है। गांव की लड़कियां कुश्ती में पारंगत करने के लिए गांव में लड़कियों के लिए प्रशिक्षण केंद्र खोलने की तैयारी में हैं।
पसंद है लड़कों की तरह पेट्रोल पंप पर काम करना: सेक्टर-41 स्थित लेफ्टिनेंट विजयंत मोटर्स पेट्रोल पंप पर  पेट्रोल भरने का काम करने वाली  19 वर्षीय शालू को अपना ये काम काफी पसंद है। उन्हें बड़ा अच्छा लगता है कि वह भी लड़कों की तरह आठ घंटे लगातार भारी नोजल पकड़कर पेट्रोल भरती हैं। वह बताती हैं कि पेट्रोल पंप पर ग्र्राहकों की गाडिय़ों में लड़कों को पेट्रोल भरते देख सोचा करती थी, क्या वह भी इन लड़कों की तरह ये काम कर सकती हैं। घर की माली हालत अच्छी नहीं थी और वह परिवार की आर्थिक मदद करना चाहती थी, 10 वीं पास शालू ने पेट्रोल पंप पर काम करने की ठान ली। वह बताती हैं कि अब उनके पड़ोस के लोग भी अपनी बेटियों को पेट्रोल पंप पर काम करने के लिए मना नहीं करते।
औरतों को सपर्पित एक औरत: समाजसेवी ऊषा ठाकुर का नाम उन शोषित और पीडि़त महिलाओं के लिए किसी मसीहा सरीखा है, जिन्हें उन्होंने नई जिंदगी दी है। निठारी कांड को उजागर करने का श्रेय इसी महिला को जाता है। वर्ष 2009 में उन्होंने 40 अंधी लड़कियों को माफिया से छुड़ाया। दहेज हत्या, घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं, दुष्कर्म पीडि़ताओं की मदद को इस उम्र में भी वह तत्पर रहती है। वह कहती हैं कि उन्हें उनके काम करने पर कई बार धमकियां भी मिली, लेकिन शोषित और पीडि़तों के दर्द के आगे उनका ये परेशानी कुछ भी नहीं है। वह बताती हैं कि इन दिनों वह जिले से गुम हुए बच्चों पर काम कर रही हैं, गुम होने वाले 462 बच्चों में अधिक संख्या लड़कियों की है।
पक्के इरादों से सपने हुए साकार: दादी कहती हैं, लड़के झाड़ू नहीं लगाते, वह बर्तन भी नहीं मांजते, वह बाहर खेल सकते हैं, मुझे दादी बादाम नहीं देती, लेकिन सोनू भैय्या को रोज बादाम देती हैं,लेकिन क्यों ...25 वर्षीय प्रियंका आज भी जब अपनी डायरी में लिखे इन पुराने लम्हों को याद करती हैं, तो उसकी आंखों में आंसू छलक आते हैं। अपनी मेहनत के बल पर वह दिल्ली की एक मशहूर मैगजीन में काम कर रही है। वह बताती है कि संपन्न परिवार में पैदा होने के बाद भी एक लड़की होने का खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा। पत्रकारिता का कोर्स करने के लिए अपनों से ही लड़ाई लडऩी पड़ी, लेकिन संतोष इस बात का है कि पक्के इरादों ने उनके सपने साकार कर दिए।
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रचना वर्मा