गुरुवार, १५ अक्तूबर २००९

किस मोड़ पर लाकर छोड़ा है। जीवन एक बिछोड़ा है।
पल-पल ऐसा तोड़ा है, हंसी को जैसे जोड़ा है।


बुधवार, २३ सितम्बर २००९


गज़ल की ये पंक्तियां मुझे अपने इतने करीब लगी कि मैं आम्रपाली से इसे अपने संग्रह में शामिल करने से खुद को रोक नहीं पाई।

सीनें में धधकती हैं आक्रोष की ज्वालाएं...हम लांघ गए शायद सतोष की सीमाएं..पग-पग पर प्रतिष्ठित हैं पथभ्रष्ट दुराचारी....इस नक्शे में हम खुद को किस बिन्दु से दर्शाएं....बांसों का घना जंगल, कुछ काम न आएगा, हां खेल दिखाएंगी कुछ अग्नि शलाकाएं...बीरानी बिछा दी है मौसम के बुढ़ापे ने, कुछ गुल न खिला बैठें यौवन की निराशाएं...तस्वीर दिखानी है भारत की तो दिखला दो, कुछ तैरती पतवारें, कुछ डूबती नौकाएं...

बुधवार, १२ अगस्त २००९

अन्नदाता ही जहां खुदकुशी करने पर मजबूर हो, ऐसा देश कब तक विकास पथ पर बढ़ेगा। देश का चहुंमुखी विकास हो रहा है रक्षा, अनुसंधान, तकनीकी सभी तरफ से, लेकिन क्या ये विकास सही अर्थों में विकास है.. नहीं कतई नहीं...कृषि प्रधान इस देश की नियति है मानसून प्रधान कृषि और इस व्यवसाय पर देश की आधी आबादी निर्भर करती है यानि गांवों में बसने वाला किसान हमारा अन्नदाता। जब हमारा अन्नदाता ही केवल कुछ रूपयों के लिए खुदकुशी का रास्ता इख्तियार करें तो इस विकास को क्या कहेंगे आप। हाल ही में यूपी के 70 साल के एक किसान ने केवल इसलिए कीटनाशक पीकर आत्महत्या कर ली कि वह अपनी पोती के ब्याह के लिए लिया गया एक लाख रूपए का कर्जा चुकाने में असमर्थ था.. क्योंकि सूखे के कारण उसके फसल से होने वाली आमदनी खत्म हो गई। यूपी ही क्यों कामोबेश देश के सभी राज्यों में किसानों की यहीं स्थिति है..161 जिलें सूखा प्रभावित घोषित कर दिए गए..और आला हुक्मरानों ने राज्यों द्वारा प्रभावित किसानों को दी जाने वाली डीजल सब्सिडी की 50 प्रतिशत भरपाई करने की घोषणा भी कर दी, लेकिन क्या इससे खुदकुशी करने वाले किसानों के परिवारों कोई राहत मिल पाएगी ये कहना मुश्किल है, क्योंकि ये हमारे देश की विडम्बना है कि यहां मर्ज का इलाज तब शुरू किया जाता है जब वह लाईलाज बन जाता है। क्यों भुखमरी से निपटने के लिए तैयार किए गए राष्ट्रीय ग्रामीण गांरटी योजना जैसे कार्यक्रम सफल नहीं होते, क्यों पहले से ही ऐसे इंतजाम नहीं किए जाते कि हर पेट को अन्न और हर हाथ को काम मिले... क्योंकि ना तो सरकारी तंत्र और न ही हमारी कार्यप्रणाली में ये मुद्दे प्राथमिकता के तौर पर लिए जाते है, हमारे यहां तो एक किसान की मौत से ज्यादा तव्वजो दी जाती है, टेस्ट मैच कहां होंगे, आईपीएल कहां खेला जाएगा, किस खिलाड़ी का मेडिकल टेस्ट कब होगा.. कौन किसान कहां मरा, कैसे मरा इससे हमें क्या लेना-देना.. बीसीसीआई जैसी बड़ी संस्थाएं क्या अपने खजाने में से इस आधी आबादी के लिए कुछ करने का माद्दा नहीं रखती। नहीं.. क्यों सूखे के समय किसानों की आर्थिक दशा सुधारने के लिए ऐसे सुरक्षात्मक इंतजाम नहीं किए जाते जो किसी मंत्री की तबियत खराब होने पर, किसी सेलीब्रेटी को हादसे उबारने के लिए किए जाते है.. अन्न को मोहताज जब अन्नदाता ही होगा, तो फिर ऐसे विकास और प्रगति पर हमें फक्र नहीं बल्कि शर्म आनी चाहिए।
रात में चैनल सर्फिंग करते हुए अचानक मैं एक चैनल पर आकर रूक गई, इस चैनल पर चुनाव सर्वेक्षण की तरह ही महिलाओं की स्थिति पर दर्शकों से प्रश्न पूछे गए थे और उन प्रश्नों का परिणाम चैनल दिखा रहा था... मसलन ऑफिस में महिला बॉस होने पर पुरूष की क्या मनोस्थिति होती है॥ क्या महिलाओं का पहनावा ही छेड़छाड और बलात्कार का कारण होता है॥ फंला... फंला॥ आदि। इन प्रश्नों के जवाब सुनकर भी मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ, क्योंकि हमेशा की तरह ही महिलाओं को ही तलवार की नोंक पर रखा गया था, गोया कि नैतिकता और चरित्रता का ठेका तो महिलाओं के कांधों पर ही होता है। आश्चर्य तो इस बात पर हुआ कि २१ वीं सदीं जिसे महाविकास का काल कहा जाता था, वहां भी महिलाओं को लेकर पुरूष मानसिकता में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। क्यों प्रकृति की देन हमारी शारीरिक संरचना ही हमेशा निशाने पर होती है, क्यों कोई पुरूषों की शारीरिक संचरना पर टिप्पणी नहीं करता।क्यों उनके हर पहनावे को जायज ठहराया जाता है। क्यों पुरूषों को अपनी शारीरिक संरचना को लेकर अभद्र बातें सुनने को नहीं मिलती, क्यों उन्हें लेकर सवाल-जवाबों की वो लंबी फेहरिस्त नहीं होती जिसका अक्सर महिलाओं को सामना करना पड़ता है। क्यों कि नारी को केवल उसकी शारीरिक बनावट को अलग रखकर केवल इंसान के तौर नहीं लिया जाता। कहीं भी तरक्की करने वाली महिला का सीधा संबंध उसकी मेहनत से ना जोड़कर नाहक ही शारीरिक रिश्तों से जोड़ दिया जाता है। मुझे भी अपने कार्यक्षेत्र में ये सुनने को कई बार मिला लड़की है ना इसलिए न्यूज आसानी से मिल जाती है, क्यों किसी ने ये नहीं देखा कि जला देने वाली धूप में भी यहीं लड़की रोज अपनी बीट पर जाकर मेहनत करती है, फोन पर खबरों का इंतजाम नहीं करती। काम करने के बाद भी ये सुनने को मिलना की तुम लड़की हो अगर मैंने तुम्हारी तरक्की के लिए कहा तो लोग गलत अर्थ में लेंगे॥रह भर कर कहीं मेहनत का थोड़ा बहुत क्रेडिट मिला भी तो उसकी खुशी होने के जगह दुख ही हुआ, क्योंकि फिर वहीं शरीर आड़े आ गया॥ " यार तुमको अगर अपनी तरक्की पानी है तो एक काम करना होगा जो कि तुम्हारे बस का नहीं है" ये जुमला मेरा एक पुरूष सहयोगी अपने पुरूष साथी से कह रहा था॥ क्या कहूं कि उसके ये शब्द मेरे कानों में पिघले शीशे से भी बुरा असर कर रहे थे॥ ये तो एक बार ही है, लेकिन ऑफिस में बैठकर अनगिनत बार मुझे अपने काम के लिए नहीं बल्कि इन जुमलों से बाहर आने के लिए मानसिक व्यायाम करना पड़ा। महिलाओं के काम को क्यों उनकी मेहनत के आधार पर नहीं तोला जाता, क्यों हर निगाह उनके काम को उनके शरीर के आधार पर नापती है... और मैं कहती हूं कि यदि महिला के कार्यस्थल पर किसी पुरुष सहयोगी के साथ संबंध है भी तो उसको उसके काम और तरक्की से जोड़ना किस हद तक सही है। प्रकृति ने ही पुरूष और नारी का संबंध ऐसा बनाया है कि उनका एक-दूसरे की तरफ झुकाव होना स्वाभाविक है, फिर क्यों नारी इन सब वजहों के लिए दोषी ठहराई जाती है। एक दो मामलों को छोड़ दे तो शायद ही पुरूषों को अपने कार्यस्थल पर अपनी तरक्की होने पर इस तरह के जुमलों का सामना करना पड़ता हो। बेनजीर भुट्टो हो इंदिरा गांधी हो या किरन बेदी या फिर मदर टेरेसा कहीं ना कहीं उन्हें भी ये दंश भरे जुमले सुनने को जरूर मिले होंगे चाहे पल भर के लिए ही सही॥ प्रकृति के दी इस शारीरिक बनावट में महिलाओं का क्या दोष है ये मुझे आज तक समझ नहीं आया। नारी यदि प्रतिकार करें तभी भी वह दोषी है और प्रतिकार ना करे तब भी गाज उस पर ही गिरती है॥ कब वो सहर आएगी जब हम केवल इंसान होगी, महिला, लड़की या नारी नहीं।

रविवार, २४ मई २००९

बहुत चाह के भी आज मेरे मन में उमड़ रहे भाव शब्दों की शक्ल लेने से इंकार कर रहे है, लेकिन मेरे अंदर का कवि मन मुझे कह रहा है रचनात्मकता से नाता तोड़ के तू जी नहीं पाएगी। इसलिए जो भी जैसा भी बन पड़े लिखने की कोशिश तो कर ॥ बस फिर यहीं मेरी...


क्या कहें की शब्द कुछ थम से गए है अब॥
आस ही नहीं रही कि अब ज़िन्दगी फिसल गई.
पात-पात सा झर गया जीवन से मधुमास..
स्वप्न ही नहीं, नींद भी हुई उदास॥
हम हैं क्या, क्यों है हम, अहसास भी ये है कम॥
मोड़ पर खड़े रहे हम और राह बढ़ गई...
आंधियों के गुबार में ज़िन्दगी निकल गई॥
शाम हो ..सहर हो..कि अब नहीं रहा असर॥
ज़िन्दागानी के इस सफर में मंजिलें है खो गई॥
सिलसिला ये यूं चला की हाय उम्र ढल गई...
जब तलक उठे हम की रूह भी निकल गई॥
मीत अश्क बन गए और हम जर्द हो गए।

गुरुवार, १६ अप्रैल २००९

कुछ लम्हे..यूं ही दिल को छू जाते हैं

ये कुछ पंक्तियां नीरज जी के ब्लॉग से मैंने अपने संग्रह में शामिल की है॥
इन्हें पढ़कर ऐसा लगता है कि कई अहसास ऐसे होते है जो इतने गहरे होते है कि कागज पर आते ही बेहतरीन कृति बन जाते है॥
"गुलशन की बहारों मैं, रंगीन नज़ारों मैं, जब तुम मुझे ढूंढोगे, आँखों मैं नमी होगी, महसूस तुम्हें हर दम, फिर मेरी कमी होगी...... आकाश पे जब तारे, संगीत सुनाए गे, बीते हुए लम्हों को, आँखों मैं सजाओगे, तन्हाई के शोलों मे, जब आग लगी होगी महसूस तुम्हे हर दम फिर मेरी कमी होगी, सावन की घटाओं का जब शोर सुनोगे तुम, बिखरे हुए माज़ी के राग चुनोगे तुम माहॉल के चेहरे पर जब धूल जमी होगी महसूस तुम्हे हर दम फिर मेरी कमी होगी जब नाम मेरा लोगे तुम कांप रहे होगे आंशूं भरे दामन से मुँह ढांप रहे होगे रंगीन घटाओं की जब शाम घनी होगी महसूस तुम्हें हर दम फिर मेरी कमी होगी.............. "

सोमवार, ३० मार्च २००९

बात निकली है तो दूर तलक जाएगी..

दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र हमारा देश और उससे भी बढ़कर उसके नागरिकों को प्राप्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार और इसके साथ ही कार्यपालिका, व्यवस्थापिका और न्यायपालिका पर नजर रखने के लिए बना चौथा स्तम्भ यानि मीडिया॥ अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम , लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पुरजोर बना यह चौथा स्तम्भ ही इस अधिकार पर पक्षपातपूर्ण रवैया अपना रहा है॥ यहां ये साफ कर देना जरूरी है कि यह केवल मेरा अनुभव और व्यक्तिगत राय है॥ हो सकता है कई लोग मेरी इस बात से इत्तेफाक न रखते हो, लेकिन वहीं है ना अभिव्यक्ति है, इसलिए इस अधिकार का प्रयोग करना एक जागरूक नागरिक होने के नाते मैं जरूरी समझती हूं॥ बात अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और उसके पक्षधर मीडिया पर आती है तो आज मीडिया में स्थापित और सालों से लेख लिखने वाले कुछ पुरस्कारों से नवाजे गए भद्रजनों को ही पत्रकार कहा जाता है और उन्हीं की बात पत्थर की लकीर की तरह अक्षरश: सही मानी जाती है... उन्हीं की अभिव्यक्ति को सही और जायज ठहराया जाता है॥ कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो ये सिल्वर स्पून मुंह में लिए पैदा होते है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नायक बन जाते है, लेकिन जिनके मुंह में बचपन से ही सुख -सुविधाओं की आदत हो। सभी सहज और सुलभ हो तो क्या वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ सही मायनों में समझ पाते है॥ यहां मैं यह पूछना चाहती हूं कि क्या एक अच्छे स्तर पर पहुंच गए इंसान की अभिव्यक्ति ही हमेशा सही होती है॥ क्या भगवान ने उन्हें इस चीज का ठेका दे दिया है॥ क्या निचले स्तर पर काम कर रहा इंसान हमेशा गलत ही सोचता है और अर्नगल ही लिखता है॥उसके शब्द तुच्छ और बेकार ही होते है॥ उसकी आपबीती बकवास ही होती है, क्योंकि वह किसी सम्मानित पत्रिका या अखबार का इंटरव्यू और लेख नहीं बन सकती॥क्योंकि उसका कोई स्तर नहीं होता॥ केवल इसलिए उसकी अभिव्यक्ति बेकार और रद्दी की टोकरी में डालने लायक ही होती है, लेकिन यह भी सच है कि हर किसी इंसान की रचनात्मक शक्ति अलग होती है और अभिव्यक्ति भी ॥ जरूरी नहीं कि सम्मानित जनों की अभिव्यक्ति ही समाज को सही दिशा देने का काम कर सकती है॥कभी -कभी आधारहीन जीवन जी रहे इंसान की अभिव्यक्ति भी रोशनी का दिया दिखा सकती है... मीडिया में उच्च पदस्थ व्यक्तियों को बस अपना अंह त्याग कर यह समझने की जरूरत है और फिर मीडिया में एक नया दौर शुरू होने से कोई नहीं रोक सकता॥ संघर्ष कर रहा हर इंसान केवल अपने फायदे और स्वार्थ के लिए नाहक और बेकार की बातें नहीं करता॥ वो तो चाहता कि संघर्ष तो हो, लेकिन योग्यता और योग्यता के बीच और विचारों और धारणाओं के मध्य, ना कि चाटुकारिता और अपना हाथ ऊपर रखने की परिपाटी को आगे बढ़ाने के लिए संघर्ष करना पड़े॥ बस इतना ही कहूंगी मीडिया में आने वाले प्रत्येक इंसान को यह गुनगुनाना चाहिए। " मैं पल दो पल का शायर हूं, पल दो पल मेरी कहानी है॥पल दो पल मेरी हस्ती है पल दो पल मेरी जवानी है...मुझसे पहले कितने शायर आए और आकर चले गए, मुझसे बेहतर कहने वाले, तुमसे बेहतर सुनने वाले॥ मैं भी एक पल का किस्सा हूं वो भी एक पल का किस्सा थे.. कल तुम से जुदा हो जाऊंगा"