सोमवार, जनवरी 20, 2014

भावनात्मकता के मोड़ पर हम क्यों कमजोर ?


अपनी कोख में जीवन के नए अंकुर को पोषण देने वाली सृष्टिस्वरूपा है नारी। धैर्य के साथ अपने घर को सदा के लिए त्याग जीवनसंगिनी बन एक नए परिवार की जिम्मेदारी संभाल लेती है वह, इतना सशक्त होने के बाद भी जाने क्यों एक पुरुष की बेवफाई के आगे वह इस कदर कमजोर हो जाती है कि अपना अस्तिव समाप्त करने जैसा आत्मघाती कदम तक उठा लेती है। सुनंदा पुष्कर के मामले में यहीं हुआ। वह हर तरह से एक सशक्त नारी थी। इस कदर वह भावनात्मक रूप से कमजोर होकर जीवन से हार कैसे मान सकती थी। जिन भावनाओं से नारी संसार को खूबसूरत बनाने का दम रखती है, उन्हीं के आगे हार का ये सवाल अब भी चुभता हैं कहीं। शायद पौराणिक काल से ही नारी अपनी इसी कमजोरी की वजह से दमन का शिकार होने को मजबूर हुई। हर युग में कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाली सहचर्या को पुरुष ने उसकी भावना के स्तर पर क्षीण करने का हथियार शायद बहुत पहले ही पहचान लिया था, इसी वजह से वह उसे इस मोड़ पर ले आता है जहां वह शराबी पति, पिता भाई से मार खाने के बाद भी उनसे जुड़ी रहने की विवशता से बंधी रहती है। भावनात्मकता की इस शक्ति को उसे अपने को हर स्थिति में सशक्त रखने के लिए इस्तेमाल करने की क्षमता विकसित करनी ही होगी। अन्यथा द्रौपदी का चीर हरण और निर्भया का बलात्कार हर युग की कहानी बनती रहेगी। ब्वॉयफ्रैंड के फोन न करने से परेशान होकर ट्रेन के आगे कूद जाने वाली, जहर खाकर जान दे देने वाली प्रवृतियों से बाहर आकर, कुछ सार्थक कर दिखाने की इच्छा बलवती करना बेहद जरूरी है।