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सोमवार, मार्च 02, 2009

कहने से कब कोई अपना होता है...

लाख मनाओ, लाख बुलाओ, कहने से कब कोई अपना होता है॥
मन का ये कोई भ्रम है, लेकिन कब क्योंकर कम होता है...
दम साधे जब रिश्ते बुनते, उनको ही रोते-हंसते है,
फिर भी कैसा खेल है जाने रिश्ते ही सुई से चुभते॥
हम मर-मर के जी जाते है, आंसू भी पी जाते है...
स्वप्न सलोना अपनेपन का पल-पल टूट सा जाता है।
नींद से जागा बचपन जैसे, हंसते-हंसते रो पड़ता है।
कोई कहानी कोई लोरी तब फिर है काम ना आती॥
अपनेपन के खालीपन की एक कसक है रह भर जाती।
सूनेपन की ये अंधियारी रात ना जाने कब जाएगी
अपनेपन की सहर जाने फिर कब आएगी।