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सोमवार, मार्च 30, 2009
बात निकली है तो दूर तलक जाएगी..
दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र हमारा देश और उससे भी बढ़कर उसके नागरिकों को प्राप्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार और इसके साथ ही कार्यपालिका, व्यवस्थापिका और न्यायपालिका पर नजर रखने के लिए बना चौथा स्तम्भ यानि मीडिया॥ अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम , लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पुरजोर बना यह चौथा स्तम्भ ही इस अधिकार पर पक्षपातपूर्ण रवैया अपना रहा है॥ यहां ये साफ कर देना जरूरी है कि यह केवल मेरा अनुभव और व्यक्तिगत राय है॥ हो सकता है कई लोग मेरी इस बात से इत्तेफाक न रखते हो, लेकिन वहीं है ना अभिव्यक्ति है, इसलिए इस अधिकार का प्रयोग करना एक जागरूक नागरिक होने के नाते मैं जरूरी समझती हूं॥ बात अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और उसके पक्षधर मीडिया पर आती है तो आज मीडिया में स्थापित और सालों से लेख लिखने वाले कुछ पुरस्कारों से नवाजे गए भद्रजनों को ही पत्रकार कहा जाता है और उन्हीं की बात पत्थर की लकीर की तरह अक्षरश: सही मानी जाती है... उन्हीं की अभिव्यक्ति को सही और जायज ठहराया जाता है॥ कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो ये सिल्वर स्पून मुंह में लिए पैदा होते है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नायक बन जाते है, लेकिन जिनके मुंह में बचपन से ही सुख -सुविधाओं की आदत हो। सभी सहज और सुलभ हो तो क्या वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ सही मायनों में समझ पाते है॥ यहां मैं यह पूछना चाहती हूं कि क्या एक अच्छे स्तर पर पहुंच गए इंसान की अभिव्यक्ति ही हमेशा सही होती है॥ क्या भगवान ने उन्हें इस चीज का ठेका दे दिया है॥ क्या निचले स्तर पर काम कर रहा इंसान हमेशा गलत ही सोचता है और अर्नगल ही लिखता है॥उसके शब्द तुच्छ और बेकार ही होते है॥ उसकी आपबीती बकवास ही होती है, क्योंकि वह किसी सम्मानित पत्रिका या अखबार का इंटरव्यू और लेख नहीं बन सकती॥क्योंकि उसका कोई स्तर नहीं होता॥ केवल इसलिए उसकी अभिव्यक्ति बेकार और रद्दी की टोकरी में डालने लायक ही होती है, लेकिन यह भी सच है कि हर किसी इंसान की रचनात्मक शक्ति अलग होती है और अभिव्यक्ति भी ॥ जरूरी नहीं कि सम्मानित जनों की अभिव्यक्ति ही समाज को सही दिशा देने का काम कर सकती है॥कभी -कभी आधारहीन जीवन जी रहे इंसान की अभिव्यक्ति भी रोशनी का दिया दिखा सकती है... मीडिया में उच्च पदस्थ व्यक्तियों को बस अपना अंह त्याग कर यह समझने की जरूरत है और फिर मीडिया में एक नया दौर शुरू होने से कोई नहीं रोक सकता॥ संघर्ष कर रहा हर इंसान केवल अपने फायदे और स्वार्थ के लिए नाहक और बेकार की बातें नहीं करता॥ वो तो चाहता कि संघर्ष तो हो, लेकिन योग्यता और योग्यता के बीच और विचारों और धारणाओं के मध्य, ना कि चाटुकारिता और अपना हाथ ऊपर रखने की परिपाटी को आगे बढ़ाने के लिए संघर्ष करना पड़े॥ बस इतना ही कहूंगी मीडिया में आने वाले प्रत्येक इंसान को यह गुनगुनाना चाहिए। " मैं पल दो पल का शायर हूं, पल दो पल मेरी कहानी है॥पल दो पल मेरी हस्ती है पल दो पल मेरी जवानी है...मुझसे पहले कितने शायर आए और आकर चले गए, मुझसे बेहतर कहने वाले, तुमसे बेहतर सुनने वाले॥ मैं भी एक पल का किस्सा हूं वो भी एक पल का किस्सा थे.. कल तुम से जुदा हो जाऊंगा"
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