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सोमवार, फ़रवरी 22, 2010

नकारात्मक भी एक सृजन हैं

मेरी इन कविताओं को देखकर या पढ़कर मुझे नकारात्मक माना जा सकता है, लेकिन मैं कहती हूं, मेरी इस नकारात्मक प्रवृति ने मुझे जीवन में कई बार ठोकर खाने के बाद भी जीवन के इस संग्राम में खड़े होने की और इसे जीतने की प्रेरणा दी है॥ तो फिर मैं कहती हूं कि कुछ लम्हें बस यूं ही आते है, लेकिन बहुत कुछ समझा और सीखा के चले जाते है॥ कुछ इस तरह।

हां ऐसा भी होता है जिन्दगी में...जब अपनी ही जिन्दगी बेगानी सी लगती है।तब दूर-दूर तक कोई आस नहीं होती, जीवन के लिए प्यास भी नहीं होती..और फिर अपनी ही जिन्दगी का बोझ सहना मुश्किल हो जाता है..सारी शिक्षाएं, सारे उपदेश तब मुंह चिढ़ाते से लगते है।चाहकर भी कुछ ना कर पाने की कसक, रह-रह के मन मे उठती है। और फिर मन खुद को ढाढ़स बधाता है। एक बार फिर से सारी शक्ति को बटोरकर जीवन के महासमर में उतरने को ललकारता है, लेकिन एक नहीं दो बार नहीं अनगिनत बार इस महासंग्राम में पराजय का सामना करता इंसान क्या करें ........और क्या ना करें की कशमकश में उलझता है..फिर भी पार पाने की एक कोशिश जिंदा रहती है.. हालांकि लोग तोलते है इन परेशानियों को पाप और पुण्य के तराजू  में... लेकिन पाप और पुण्य में क्या कोई वास्तव में फर्क कर पाया है। भागती हुई सी इस जिंदगी में क्या एक पल भी सुकून का किसी ने पाया है... यदि हां तो उसने देव भाग्य पाया है।