इन दिनों मीडिया जगत में हिन्दुस्तान खबरों की वजह से नहीं बल्कि दैनिक हिंदुस्तान, दिल्ली के वरिष्ठ स्थानीय संपादक प्रमोद जोशी द्वारा वरिष्ठ पत्रकार शैलबाला से दुर्व्यवहार किए जाने और एचटी मीडिया और प्रमोद जोशी के संयुक्त रूप से उनके और अन्य पत्रकारों पर मानहानि को लेकर चर्चा में बना हुआ है। यह तो शैलबाला जी थी जो उन्होंने आगे आकर अपने पर हुए अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत की, लेकिन यहां मैं एक बात और बता देना चाहती हूं कि हिन्दुस्तान के एनसीआर के कार्यालयों में महिला पत्रकारों के साथ अभद्र व्यवहार होना आम बात है॥ फिर चाहे वह गाजियाबाद हो फरीदाबाद हो या॥ मजे की बात है की कई महिला पत्रकार संगठनों में महिलाओं की अगुवाई करने वाली दैनिक हिन्दुस्तान की संपादक मृणाल पांडे के नक्शे कदम पर ये हो रहा है॥ सम्मानित पत्रकारों में गिनी- जाने वाली संपादिका महोदय को संस्थान में क्षेत्रवाद से फुर्सत मिले तो तब कहीं जाकर वह इन मुद्दों पर ध्यान दे पाए। कभी मेरे लिए आर्दश रही मृणाल पांडे आज मुझे एक दंभी और बनावटी औरत से ज्यादा कुछ नहीं लगती, यहां मेरा यह बताना आवश्यक है कि
उनसे मेरा कोई व्यक्तिगत द्वेष नहीं है, लेकिन यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि उनके साथ काम करने वाली प्रत्येक महिला ने ऐसा ही अनुभव किया होगा, भले ही वह इसे सबके सामने प्रदर्शित करने से घबराती हों, लेकिन मेरी अंतरआत्मा मुझे ऐसा करने से नहीं रोकती, वह कहती है तुम कह डालो॥ नारी सरोकारो को दंभी और पांखड़ी लोगों के हाथों का खिलौना मत बनने दो... लगभग एक साल पहले ही बात है फरीदाबाद ब्यूरों में काम करते वक्त मेरे तत्कालीन ब्यूरो चीफ ने मुझे कई तरह से परेशान करना शुरू किया.. पहले तो मैं सहती रही॥ जब नहीं सहा गया तो मैं प्रतिरोध पर उतर आई, लेकिन मेरे ब्यूरो चीफ मुझसे कहते रहे कि मैं सही हूं और तुम नाहक ही मेरी कार्य प्रणाली में नुस्खे निकाल रही हो... जब उनका व्यवहार नहीं बदला तो मैंने सबसे पहले एनसीआर प्रभारी को इस बात की जानकारी दी, लेकिन वहां से भी मुझे कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला, इसके बाद मैंने वरिष्ठ स्थानीय संपादक प्रमोद जोशी को अपनी समस्या बताई, लेकिन कहते है ना कि चोर-चोर मौसेरे भाई... इतना ही नहीं मैंने उन्हें ये भी कहा कि आपकी भी बेटी है, कृप्या इस मामले को इस दृष्टि से देखने का प्रयास करें, लेकिन पत्रकारिता में इतने चिकने घड़े है कि गिनते -गिनते थक जाएंगे, लेकिन खत्म नहीं होंगे... मेरे मामले में ना कुछ होना था और ना हुआ, अंततः मैंने त्यागपत्र दे डाला, लेकिन मन में एक इच्छा थी की क्या मीडिया में काम करने वाली महिलाओं को ये सब सहना पड़ता है॥ इस ऊहापोह में जूझ ही रही थी कि मेरे एक सहयोगी ने मुझे मृणाल पांडे से मिलने की सलाह दी... बचपन से दूरदर्शन पर न्यूज एंकर के रूप में देखकर और शिवानी जी की पुत्री के रूप में उनकी बड़ी ही श्रद्धेय सी छवि मेरे मन में थी, बहरहाल उनसे मिलने उनके ईस्ट ऑफ कैलाश स्थित निवास पर पहंच गई। इस आस के साथ की वह मुझे सुनेगी और कम से कम अन्य महिला पत्रकारों को सहूलियत हो जाएगी, लेकिन उनसे मिलना किसी बुरे सपने से कम नहीं था, पर्दे पर और बाहरी दुनिया में जहीन और विनम्र दिखने वाली मृणाल पांडे दनदनाती हुई अपने आलीशान घर की सीढ़ीयों से जींस और टॉप पहने उतर रही थी॥ अंतिम सीढ़ी पर उनके पहंचते ही मैं उनके सामने अपनी बात रखने जा पहंची, लेकिन मेरी बात सुनना तो दूर उन्होंने मेरी तरफ देखना भी गंवारा नहीं किया॥लेकिन मैं भी अपनी बात कहने के लिए कृतसंकल्प होकर आई थी, इसलिए साथ ही उनके बड़ी सी आलीशान गाड़ी की तरफ मैं भी चल पड़ी... परेशानी है तो नौकरी छोड़ दो॥ मैडम मैंने नौकरी छोड़ दी है॥ प्रमोद जोशी से जाकर ऑफिस में मिलों, मुझे इससे कोई मतलब नहीं है। धड़ाक से कार का दरवाजा बंद होता और मेरे नजरों के सामने मेरे बचपन की आर्दश रही मृणाल पांडे तानाशाह की तरह गुजर जाती है...उनके इस दंभी व्यवहार ने मुझे एक बात सीखा दी कि जब -तक किसी से मिल ना लो उसे आर्दश मत बनाओ॥यह तो रही मेरी बात लेकिन हिन्दुस्तान के ही सहयोगियों ने मुझे बताया कि दिल्ली में कार्यरत महिला पत्रकार नरगिस हुसैन ने उनसे अपनी गर्भावस्था के दौरान छुट्टी मांगी तो उन्होंने उसके मुंह पर इतनी जोर से अखबार पटक कर मारा, हालांकि यह मेरी आंखों देखी घटना नहीं है, लेकिन एनसीआर प्रभारी रही इरा झा के साथ भी उन्होंने कुछ ऐसा ही व्यवहार किया और प्रमोद जोशी को शह देती रहे। मैं इस बात के विश्वास से नहीं कह सकती, लेकिन इतना सुना है कि प्रमोद जोशी उनके दूर के भाई लगते है॥ ऐसे भाई -भतीजावाद निभाने वाले लोगों को पत्रकार नहीं कहा जा सकता वो भी वरिष्ठ पत्रकार की पदवी॥न तो मृणाल पांडे को महिला संगठनों की अगुवाई करने का हक है और ना किसी समसामयिक विषय और राजनीति पर लेख लिखने का॥ वह तो हिन्दुस्तान में एक महिला डॉन की तरह पदासीन है और उनके गुर्गे ॥ इससे मुझे याद आया कि गाजियाबाद में भी एक महिला पत्रकार के साथ भी ऐसा अभद्र व्यवहार हुआ॥ जब उन्होंने इसकी शिकायत मृणाल जी के पंसदीदा दांए हाथ से की तो उसे मदद मिलने की बजाए॥संस्थान से बाहर निकाल देने की धमकी दी गई...चलो मृणाल जी को छोड़ भी दे तो महिला सांसद और हिन्दुस्तान की मालकिन शोभना भरतिया की समझ पर क्या पत्थर पड़ गए है जो वह इन मामलों में निष्पक्ष नहीं हो पा रही है... हिन्दुस्तान के लिए तो केवल यही कहा जा सकता है कि "अंजामें गुलिस्ता क्या होगा॥ जब हर शाख पर उल्लू बैठा है"