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गुरुवार, मार्च 12, 2009

कई साल लग गए खुद को ही जानने में

अमृता प्रीतम की तरफ मेरा झुकाव बचपन से ही रहा है शायद तब से ही जब से उनके लिखे उपन्यासों और कहानियों पर आधारित सीरियल दूरदर्शन पर आया करते थे...तब केवल बस अपनी बुआ से सुनकर मुझे पता रहता था कि वह काफी बड़ी लेखिका है... लेकिन कुछ भी था मात्र १२-१३ साल की उम्र में भी उनका सृजन मुझे अपने जीवन के काफी करीब लगा... और शायद मेरी बुआजी भी इसलिए ही उन्हें पसंद करती थी... धीरे-धीरे पढ़ाई और युवावस्था के भंवर में मेरा ये लगाव कुछ कम हो गया, लेकिन एक बार फिर अमृता प्रीतम ने मेरे मन पर दोबारा से दस्तक दी , शायद सात साल पहले पत्रकारिता का कोर्स करते वक्त दोबारा से मेरी फरीदाबाद वाली बुआ के घर मुझे रसीदी टिकट पढ़ने को मिल गई। एक ही रात में इस किताब को मैं पढ़ गई और इस पर लिखा गीत... घूंट चांदनी पी है हमने... मेरे मन में अंदर तक उतर गया॥ अपनी निजी डायरी में मैंने यह पंक्तियां बड़े ही सुंदर अक्षरों में लिख डाली, लेकिन तब-तक भी इन पंक्तियों का भाव मुझ पूरे अर्थ में समझ नहीं आया या मैंने कोशिश ही नहीं की....लेकिन ठीक सात साल बाद यहीं पंक्तियां पढ़कर लगता है, कि यहीं तो थी मैं... जाने कब से खुद को ढूंढ रही थी॥ बात कुफ्र की है मैंने घूंट चांदनी पी है मैंने...
घूंट चांदनी की पी है हमने...
"पता नहीं, कौन कौन कहां कहां कब कब अपने प्रेम की चादर कम्बल या ओवर कोट पहना कर चला जाता है। कई बार जानते हैं, कई बार नहीं भी। कई बार जानकर भी नहीं जानते और कई बार नहीं जानकर भी जानते हैं...."

अम्बर की एक पाक सुराही ,बादल का एक जाम उठा कर घूंट चांदनी की पी है हमने .बात कुफ्र की की है हमने ...कैसे इसका क़र्ज़ चुकाएं .मांग के मौत के हाथों यह जो ज़िन्दगी ली है हमने .बात कुफ्र की की है हमने अपना इस में कुछ भी नहीं है ,रोजे -अजल से उसकी अमानत उसको वही तो दी है हमने ,बात कुफ्र की की है हमने ....