गुरुवार, अप्रैल 16, 2009

एहसास जो कृति में ढल गए

ये कुछ पंक्तियां नीरज जी के ब्लॉग से मैंने अपने संग्रह में शामिल की है॥
इन्हें पढ़कर ऐसा लगता है कि कई अहसास ऐसे होते है जो इतने गहरे होते है कि कागज पर आते ही बेहतरीन कृति बन जाते है॥

"गुलशन की बहारों मैं, रंगीन नज़ारों मे , जब तुम मुझे ढूंढोगे, आँखों मे  नमी मे होगी,
महसूस तुम्हें हर दम, फिर मेरी कमी होगी...
 आकाश पे जब तारे, संगीत सुनायेंगे
 बीते हुए लम्हों को, आँखों मैं सजाओगे, तन्हाई के शोलों मे, जब आग लगी होगी
 महसूस तुम्हे हर दम फिर मेरी कमी होगी...
सावन की घटाओं का जब शोर सुनोगे तुम, बिखरे हुए माज़ी के राग चुनोगे तुम
माहौल  के चेहरे पर जब धूल जमी होगी
महसूस तुम्हे हर दम फिर मेरी कमी होगी
जब नाम मेरा लोगे तुम कांप रहे होगे आंसू  भरे दामन से मुँह ढांप रहे होगे रंगीन घटाओं की जब शाम घनी होगी महसूस तुम्हें हर दम फिर मेरी कमी होगी.............. "

7 टिप्‍पणियां:

विक्रांत ने कहा…

नीरज जी के ब्लॉग का लिंक भी दीजिये.
ये इक चर्चित ग़ज़ल की पंक्ति है.

विक्रांत ने कहा…

नीरज जी के ब्लॉग का लिंक भी दीजिये.
ये इक चर्चित ग़ज़ल की पंक्ति है.

RAJNISH PARIHAR ने कहा…

कितनी सही बात की है नीरज जी ने...आपने याद दिलाया तो याद आया...!इसलिए आप को धन्यवाद...

Vidhu ने कहा…

bahut achchi panktiyan aur bhaavnaayen...umeed hai theek hogi

अनिल कान्त : ने कहा…

इसे पेश करने के लिए शुक्रिया ...बहुत अच्छी लगी ....

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

समयचक्र - महेन्द्र मिश्र ने कहा…

समयचक्र: चिठ्ठी चर्चा : देख तेरे संसार की हालत, क्या हो गई भगवान,कितना बदल गया इन्सान के साथ आपकी पोस्ट की चर्चा .

सागरदीप ~ गहराई और अँधेरा और कुछ नहीं ??? ने कहा…

BAHUT KHOOB ,