गुरुवार, सितंबर 12, 2013

22 साल के दर्द की दवा तलाशती हूं....


सरबजीत सिंह की बहन से ये बातचीत उनके 3 सितंबर 2012 में नोएडा आगमन पर हुई थी, लेकिन किसी कारण वश ये दैनिक जागरण में प्रकाशित नहीं हुई। आज पुरानी फाइल चेक करते समय इस पर नजर पड़ी तो लगा कि इसे शेयर किया जाना चाहिए। 



- मीडिया से की अपील प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री की पाक यात्रा से पहले उठाए इस मुद्दे को
- पहले ही सरबजीत का मामला गंभीरता से लिया जाता तो घर होता वह
- भाई को वापस लाना ही लक्ष्य
रचना वर्मा,नोएडा:''सरहदों की हदें इस कदर पक्की हैं कि तेरे-मेरे दर्द का उससे वास्ता नहीं, मेरे घर का एक टुकड़ा सरहद के उस पार आज भी है, चंद मीलों के इस फासले को सदियों में तब्दील कर डाला सियासतों के चंद सिलसिलों नेÓÓ पाक में बंद सरबजीत सिंह की दीदी दलबीर कौर के दिल में यहीं सवाल बार-बार उठता हैं कि आखिर उसके छोटे भाई का दोष क्या था, जो उसे अपनों से दूर होकर जिंदगी काटनी पड़ रही हैं। भाई की रिहाई के लिए अभिनेता रजा मुराद की मुहिम के तहत वह उनसे मिलने नोएडा आई थी। भाई के पाक कैदी होने का उनके परिवार को जो सिला मिला वह उन्होंने बयां किया।
नौ महीने तक पता नहीं था भाई का: दलबीर बताती हैं कि पंजाब के भिखीविंड में उनका किसान भाई सरबजीत सिंह खुशी से रह रहा था। 28 अगस्त 1990 को अचानक भाई गुम हो गया। दोस्तों, रिश्तेदारों में ढूंढा, लेकिन नौ महीने तक कुछ पता नहीं चला, अचानक घर में एक चिट्ठी आई। सरबजीत ने इसमें लाहौर कोर्ट में पहली पेशी का पूरा मजमून लिख डाला। पाक हुकूमत ने उसे सीधे साधे किसान से मनजीत कौर बम धमाके के आरोपी का तमगा दे डाला था, उसके बाद इतनी चिïिट्ठयां आई जिनकी गिनती भी नहीं की जा सकती।
हुकूमत ने नहीं लिया गंभीरता से: उनके परिवार की इस दिक्कत को शुरूआती दौर में हिन्दोस्तान की सरकार से गंभीरता से नहीं लिया, वरना अब तक भाई रिहा हो गया होता। उसे एक आम नागरिक की तरह रिहा कराने के बदले उसकी रिहाई की मांग भी आंतकवादी मुद्दे को लेकर की जाती। ये कहना है दलबीर कौर का। वह बताती हैं कि तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव से लेकर गृहमंत्री से वह इस मामले को लेकर मिलती रहीं थी। इस मामले को हवा मीडिया में आने के बाद मिली वह मीडिया की शुक्रगुजार हैं। मीडिया से उनकी अपील है कि सितंबर में प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री की प्रस्तावित पाक यात्रा से पहले इस मुद्दे को उठाएं तो शायद वह इस वर्ष की दीपावली अपने भाई के साथ मना पाएं।
पल-पल कमी महसूस होती है सरबजीत की: सरबजीत  पिता के बाद परिवार में दूसरा मर्द था। जब वह गुम हुआ छोटी बेटी पूनम 23 दिन और बड़ी बेटी स्वपनदीप कौर दो ïवर्ष की थी। बेटियों के सिर बाप का प्यार का साया छीन गया। पैरेंट्स मीटिंग में भाभी सुखप्रीत अकेली जाती, बच्चे पिता के बारे में पूछते तो उसकी आंखों से आंसू झरते। घर की आर्थिक स्थिति भी खराब हो चली थी। पिता सुलखन भाई की फोटो को सोने से पहले सैल्यूट करते और कहते 'साब जी में सोने चला, तुमसे मिलना चाहता हूं, जल्दी आ जाओं कहीं तुम्हारे आने से पहले न चल दूं।Ó गांव के किसी भी समारोह में जाते भाई को याद कर रोते रहते। एक दिन इसी दुख में चल बसे।
खुशी देकर गम दिया: वह बताती है जब मीडिया में हर तरफ उनके भाई की रिहाई की खबरें चल रही थी, परिवार में जश्न का माहौल था। अचानक जैसे घर में मातम छा गया, क्योंकि भाई की जगह सुरजीत की रिहाई हुई। हालांकि ये अच्छा हुआ कि किसी को तो उसके घर वापस आने को मिला।
22 साल से राखी को इंतजार: वह कहती हैं कि विवाहित होने के नाते कई बार उन्हें भाई की रिहाई की इस मुहिम के लिए ससुरालवालों के खिलाफ भी जाना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य ही भाई को वापस लाना बना लिया है। 22 साल से उनकी राखी भाई की कलाई का इंतजार करती रहीं। वह बाघा बार्डर पर जाकर फौजियों को राखी बांधती रहीं, लेकिन जब भी वहां जाती दो सरहदों पर खिंची उस लाइन को घंटों देखा करती। सोचती ये न होती लाहौर और बाघा साथ मिलकर प्यार का गीत गाते।
राहुल गांधी के लिए दुआ: वर्ष 2008 में राहुल गांधी ने सरबजीत के मामले को गंभीरता से लिया। इसके बाद सोनिया जी, गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे, विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने भी उनके मन में उम्मीद जगाई है। राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के बेटे अभिजीत मुखर्जी की पहल के लिए उनका परिवार अहसानमंद है। पाक में असमां जहांगीर, एनजीओ और आसिफ अली जरदारी की ईमानदार कोशिशों के साथ ही अपने देश के हर एक बाशिंदे से मिले सहयोग को सलाम करती है।
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रचना वर्मा  

शुक्रवार, सितंबर 06, 2013

बांसुरी है जीवन सरीखी: पंडित हरिप्रसाद चौरसिया




- बांसुरी अजेय है और रहेगी
-हुनर की तुलना करना ठीक नहीं
- संगीत की एक है बोली
रचना वर्मा,नोएडा: ''मुझे अंग्र्रेजी अधिक नहीं आती, बच्चों हिंदी में बात करूंगा तो समझ जाएओ ना... चेहरे पर विस्मित कर देने वाली कृष्ण सरीखी मुस्कान, अधरों से कुछ दूरी पर हाथों में  बांसुरी...ÓÓ कुछ इस अंदाज में मशहूर बांसुरी वादक पंडित हरिप्रसाद चौरसिया सेक्टर-56 स्थित सरला चोपड़ा डीएवी सेंटनेरी स्कूल में छात्रों से रूबरू हुए। इस दौरान उन्होंने बांसुरी और उसके भविष्य को लेकर विशेष बातचीत की।
चंद्रमा और बल्ब के प्रकाश की तुलना नहीं: बांसुरी वादन के शिखर पर पहुंचने वाले पंडित चौरसिया न  बांसुरी वादन का भविष्य उज्जवल बताया। उन्होंने कहा कि आधुनिक वाद्य यंत्रों के बीच आज भी बांसुरी अजेय है, क्योंकि बल्ब का प्रकाश अलग है और चंद्रमा का अलग। बांसुरी भूत में थी, वर्तमान में है और भविष्य में भी रहेगी। ये वाद्य पूरे विश्व में अपनी पहचान बना चुका है। भले ही नई पीढ़ी बांस की बनी बांसुरी न बजाती हो, लेकिन कहीं स्टील तो कहीं अन्य वस्तुओं से बनी बांसुरी वह अपने संगीत में शामिल कर चुकी है।
जीवन सरीखी है बांसुरी: बांसुरी सबसे पुराना वाद्य यंत्र है। भगवान श्रीकृष्ण की सोच ने इसे लोक वाद्य बनाया और उन्ही की तरह ये हर जगह पहुंच गई। इसका निर्माण कारखाने में नहीं होता। एक तरह से बांसुरी मानव जीवन सरीखी है, इसकी उम्र और जीवन -मरण भी अनिश्चित है। इसके लिए जंगलों से चुन के बांस लेना पड़ता है, वह बांस सीधा और गांठ रहित होना आवश्यक होता है। इसके निर्माण के बाद मानव जीवन की तरह ही इसके चलने का कोई पता नहीं होता।
सामान्य और साधारण ही होता है अप्रितम: पंडित चौरसिया ने कहा कि जो भी सादगी से परिपूर्ण है, वह मधुर है, सुंदर, अप्रितम है, संगीत के साथ भी ये बात लागू होती है। ये जरूरी नहीं आगे आने वाले बांसुरी वादन की पीढ़ी उनकी बांसुरी वादन की विरासत को आगे बढ़ाए, इसलिए वह हुनर की तुलना को सही नहीं समझते। जिस तरह हर फूल की अपनी खूबसूरती होती है, उसी तरह हर एक के हुनर की अपनी खासियत होती है।
संगीत का एक है मजहब: बांसुरी पर ओम जय जगदीश भी बजता है और जिंगल बेल जिंगल बेल भी दोनों ही संगीत का रूप है भले ही भाषा अलग हो। संगीत कहीं का भी हो, उसके स्वर लय एक है। संगीत किसी देश या क्षेत्र विशेष का नहीं होता, बस हमारे विचारों का अंतर ही इसे देश काल की परिधि में बांधता है। ये बात फिल्मी संगीत पर भी लागू होती है, स्वर अच्छे लगे, लय, ताल ठीक हो, अच्छे से लिखा गीत हो तो फिल्मी संगीत भी अच्छा है। इतना ही कहंूगा कि जो जिसको भा जाएं वो अच्छा है।
संघर्ष में है जीवन का आनंद: पंडित चौरसिया बताते हैं कि उनके पिता उन्हें कुश्ती के दांव सीखा पहलवान बनाने के इच्छुक थे। पिता की इस इच्छा से उन्हें जीवन से संघर्ष करने की सीख मिली। जिस तरह कुश्ती में जीतने के लिए संघर्ष करना पड़ता है, उसी तरह जीवन के हर क्षेत्र हर विषय में संघर्ष हैं, क्योंकि संघर्ष में ही जीवन का आनंद है
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