बुधवार, अगस्त 12, 2009

कोई पैकरे एहसास से ढाले हमकों

रात में चैनल सर्फिंग करते हुए अचानक मैं एक चैनल पर आकर रूक गई, इस चैनल पर चुनाव सर्वेक्षण की तरह ही महिलाओं की स्थिति पर दर्शकों से प्रश्न पूछे गए थे और उन प्रश्नों का परिणाम चैनल दिखा रहा था... मसलन ऑफिस में महिला बॉस होने पर पुरूष की क्या मनोस्थिति होती है॥ क्या महिलाओं का पहनावा ही छेड़छाड और बलात्कार का कारण होता है॥ फंला... फंला॥ आदि। इन प्रश्नों के जवाब सुनकर भी मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ, क्योंकि हमेशा की तरह ही महिलाओं को ही तलवार की नोंक पर रखा गया था, गोया कि नैतिकता और चरित्रता का ठेका तो महिलाओं के कांधों पर ही होता है। आश्चर्य तो इस बात पर हुआ कि २१ वीं सदीं जिसे महाविकास का काल कहा जाता था, वहां भी महिलाओं को लेकर पुरूष मानसिकता में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। क्यों प्रकृति की देन हमारी शारीरिक संरचना ही हमेशा निशाने पर होती है, क्यों कोई पुरूषों की शारीरिक संचरना पर टिप्पणी नहीं करता।क्यों उनके हर पहनावे को जायज ठहराया जाता है। क्यों पुरूषों को अपनी शारीरिक संरचना को लेकर अभद्र बातें सुनने को नहीं मिलती, क्यों उन्हें लेकर सवाल-जवाबों की वो लंबी फेहरिस्त नहीं होती जिसका अक्सर महिलाओं को सामना करना पड़ता है। क्यों कि नारी को केवल उसकी शारीरिक बनावट को अलग रखकर केवल इंसान के तौर नहीं लिया जाता। कहीं भी तरक्की करने वाली महिला का सीधा संबंध उसकी मेहनत से ना जोड़कर नाहक ही शारीरिक रिश्तों से जोड़ दिया जाता है। मुझे भी अपने कार्यक्षेत्र में ये सुनने को कई बार मिला लड़की है ना इसलिए न्यूज आसानी से मिल जाती है, क्यों किसी ने ये नहीं देखा कि जला देने वाली धूप में भी यहीं लड़की रोज अपनी बीट पर जाकर मेहनत करती है, फोन पर खबरों का इंतजाम नहीं करती। काम करने के बाद भी ये सुनने को मिलना की तुम लड़की हो अगर मैंने तुम्हारी तरक्की के लिए कहा तो लोग गलत अर्थ में लेंगे॥रह भर कर कहीं मेहनत का थोड़ा बहुत क्रेडिट मिला भी तो उसकी खुशी होने के जगह दुख ही हुआ, क्योंकि फिर वहीं शरीर आड़े आ गया॥ " यार तुमको अगर अपनी तरक्की पानी है तो एक काम करना होगा जो कि तुम्हारे बस का नहीं है" ये जुमला मेरा एक पुरूष सहयोगी अपने पुरूष साथी से कह रहा था॥ क्या कहूं कि उसके ये शब्द मेरे कानों में पिघले शीशे से भी बुरा असर कर रहे थे॥ ये तो एक बार ही है, लेकिन ऑफिस में बैठकर अनगिनत बार मुझे अपने काम के लिए नहीं बल्कि इन जुमलों से बाहर आने के लिए मानसिक व्यायाम करना पड़ा। महिलाओं के काम को क्यों उनकी मेहनत के आधार पर नहीं तोला जाता, क्यों हर निगाह उनके काम को उनके शरीर के आधार पर नापती है... और मैं कहती हूं कि यदि महिला के कार्यस्थल पर किसी पुरुष सहयोगी के साथ संबंध है भी तो उसको उसके काम और तरक्की से जोड़ना किस हद तक सही है। प्रकृति ने ही पुरूष और नारी का संबंध ऐसा बनाया है कि उनका एक-दूसरे की तरफ झुकाव होना स्वाभाविक है, फिर क्यों नारी इन सब वजहों के लिए दोषी ठहराई जाती है। एक दो मामलों को छोड़ दे तो शायद ही पुरूषों को अपने कार्यस्थल पर अपनी तरक्की होने पर इस तरह के जुमलों का सामना करना पड़ता हो। बेनजीर भुट्टो हो इंदिरा गांधी हो या किरन बेदी या फिर मदर टेरेसा कहीं ना कहीं उन्हें भी ये दंश भरे जुमले सुनने को जरूर मिले होंगे चाहे पल भर के लिए ही सही॥ प्रकृति के दी इस शारीरिक बनावट में महिलाओं का क्या दोष है ये मुझे आज तक समझ नहीं आया। नारी यदि प्रतिकार करें तभी भी वह दोषी है और प्रतिकार ना करे तब भी गाज उस पर ही गिरती है॥ कब वो सहर आएगी जब हम केवल इंसान होगी, महिला, लड़की या नारी नहीं।

3 टिप्‍पणियां:

mukesh ने कहा…

bahut afsos hua hoga ladki hone par na!, aap kya sochti hai ki samaj ka nazariya ek din ya ek mahine ya ek sal me badal jayega, nahi madamji jaise isse bhi buri parishthitiyo me ji rahi mahila aai is mukam par pahuch gayi hai usi tarah samay ke sath aage bhi sudhar jari rahega
aur jaha tak sawal raha nari ke sarir ko uski tarraki ke sath jodkar dekhne ki baat to aaj ke modern yug me ladkiyan bhi tarraki pane ke liye, acchi jagah naukari pane ke liye kisi bhi had tak jane ko tayar rahti hai,
aajkal media me kam pane ke liye struggle to ladko ko karna pad raha hai,kyoki jahan bhi kam ke liye jao to ladki ho to bakayda interview liya jata hai
wahi ladko se biodata lekar gate se hi lauta diya jata hai
jis office me ladki pahuch jaye waha ka peon se lekar badi post wale sabhi uski madad ke liye tayar dikhte hai
aur ladka pahuch jaye to uski waha ka peon bhi nahi sunta

think wat u thaught ने कहा…

rachna ji.!! bahut accha laga aapke vicharon ko padhkar...ye to sach hai ki is purush pradhan samaaj me har baar mahilaon ko hi nishan banaya jata hai..unki tarakki dekhkar yahi raag alaapa jata hai ki wo ek ladki hai ek mahila hai isliye use aisa mila....ye baat sach hai ki naitikata ka patan purusha karta hai aur dosh mahilaon ko diya jata hai...!!! haan lekin ek baat main aur kahunga..aapne yahan ek baat likhi hai ki mahilaon ko unke shaaririk banavat se kyun aanka jata hai...nahin aankana chahiye...!! unke bhadra vastron ko dekhkar koi bhi unpe comment nahi karta ye to aap bhi maanti hongi aur maine bhi ye nahi dekha hai...jahan tak pehnaave ka sawaal hai aise kapde kyun pehne jo us apraadh ko anjaam de rahe hain...aap keh rahi hain ki purushon ko koi nahi tokta ki unhone kya pehna hai ye sach hai lekin maine aaj tak kisi bhi purush ko ardhnagn sthiti me nahi dekha hai..albatta bahuteri ladkiyon ko maine is tarah ke libaas me dekha hai jo shayad uchit nahi...!!!
main bhi aapke vicharon se sehmat hu..lekin sabki apniek maryaada hai isiliye ye desh bharat hai..!! aadhunikta ke daud me itna bhi kisi ko aage nahi nikalana chahiye jisse ki ghar parivaar samaaj aur desh ka naam kalankit hoaur ye baat sab par laagu hai chaahe wo ek purush ho ya mahila.!!!

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

आज दिनांक 1 जुलाई 2010 के दैनिक जनसत्‍ता में संपादकीय पेज 6 पर समांतर स्‍तंभ में आपकी यह पोस्‍ट प्रतिकार का अपराध शीर्षक से प्रकाशित हुई है, बधाई। स्‍कैनबिम्‍ब देखने के लिए दैनिक जनसत्‍ता लिंक पर क्लिक करके पेज नंबर 4 पर क्लिक करके देख सकती हैं।