गुरुवार, अगस्त 19, 2010

सच बहुत याद आए

 वो शाम घनेरी वो रातों के साए, सच में बहुत याद आए।
 वो रूठ जाना, वो मनुहार का बहाना।
 वो हमकों हंसाना, हमको रूलाना।
 कभी पास आना, कभी दूर जाना।
 वो राह तकना, वो मिल के बिछुड़ना,
 हमको बुला के, वो हमको सताना।
 वो इतरा के प्यार लुटाना तुम्हारा।
 वो प्यारी बातों में खो जाना हमारा।
 वो सावन का आना, वो भादो बरसना।
 वो आहट तुम्हारी, वो नयनों का तरसना।
 वो सपनों से जग जाना हमारा, वो रूह से दूर जाना तुम्हारा।
 वो अहसास सच बहुत याद आया तुम्हारा ।
                      

5 टिप्‍पणियां:

भूतनाथ ने कहा…

acchhi rachnaa hai....

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

बहुत अच्छे एहसास हैं.

सादर

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति

RameshGhildiyal"Dhad" ने कहा…

rishte to bas rishte hi hote hain,
chaahe kuchh pal saath jiye hote hain.....aap achha vyakt kar pa rahi hain avyakt ko..

Kuldeep Thakur ने कहा…


सुंदर प्रस्तुति...
मुझे आप को सुचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी का लिंक 12-07-2013 यानी आने वाले शुकरवार की नई पुरानी हलचल पर भी है...
आप भी इस हलचल में शामिल होकर इस की शोभा बढ़ाएं तथा इसमें शामिल पोस्ट पर नजर डालें और नयी पुरानी हलचल को समृद्ध बनाएं.... आपकी एक टिप्पणी हलचल में शामिल पोस्ट्स को आकर्षण प्रदान और रचनाकारोम का मनोबल बढ़ाएगी...
मिलते हैं फिर शुकरवार को आप की इस रचना के साथ।



जय हिंद जय भारत...


मन का मंथन... मेरे विचारों कादर्पण...